दिल्ली के लाल किले के पास सुनहरी मस्जिद के करीब सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम जबरदस्त धमाका हुआ। एक सफेद i-20 कार में हुआ यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि 8 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक घायल हुए। यह धमाका इतना जोरदार था कि आसपास खड़ी कई गाड़ियाँ जलकर खाक हो गईं। पुलिस को घटनास्थल से एक हाथ बरामद हुआ, जिसके DNA की जाँच से हमलावर की पहचान की जा रही है।
शुरुआती जाँच में सामने आया कि कार को डॉ मोहम्मद उमर नाम का संदिग्ध चला रहा था, जो फरीदाबाद के आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा था। इस धमाके के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं और लाल किला 3 दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। लाल किला ब्लास्ट की जाँच गृह मंत्रालय ने NIA को सौंप दी है। अभी तक इस मामले की जाँच दिल्ली पुलिस कर रही थी।
कश्मीर में लगे कुछ पोस्टर बने आतंक की जाँच की शुरुआत
यह पूरी कहानी एक छोटी-सी लगने वाली लेकिन बेहद अहम घटना से शुरू हुई। श्रीनगर के नौगाम इलाके में दीवारों पर लगे धमकी भरे पोस्टरों से। अक्टूबर 2019 के बाद पहली बार अक्टूबर 2025 में ऐसे पोस्टर दिखे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के नाम से सुरक्षा बलों को खुली धमकियाँ दी गई थीं। उस समय इलाके में सामान्य शांति थी, इसलिए अचानक ऐसे पोस्टरों का सामने आना पुलिस के लिए असामान्य संकेत था।
श्रीनगर के SSP जी वी सुनीप चक्रवर्ती ने तुरंत जाँच के आदेश दिए, जिन्होंने इससे पहले कई बड़ी आतंकी कार्रवाइयों को विफल किया था। पुलिस टीमों ने इलाके की CCTV फुटेज खंगालनी शुरू की और कुछ ही दिनों में तीन ऐसे चेहरों की पहचान हुई जो पहले पत्थरबाजी और भड़काऊ गतिविधियों में शामिल रह चुके थे। इन्हीं तीन ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी ने एक ऐसी कड़ी को खोला, जिसने धीरे-धीरे एक गहरे आतंकी नेटवर्क की परतें उजागर कर दीं।
जो शुरुआत में सिर्फ कुछ पोस्टर लगने की मामूली घटना लग रही थी, वही अब देश के भीतर फैले एक मल्टी-स्टेट आतंकी मॉड्यूल का शुरुआती सुराग बन चुकी थी। ऐसा नेटवर्क, जो कश्मीर से हरियाणा और दिल्ली तक अपनी जड़ें फैला चुका था।
मौलवी इरफान से खुला आतंकी साजिश का जाल
ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो जाँच की दिशा शोपियाँ के मौलवी इरफान अहमद तक जा पहुँची। यही वह कड़ी थी, जिसने पूरे आतंक नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया। इरफान कोई आम व्यक्ति नहीं था, वह स्थानीय मस्जिद में मौलवी था और मजहब के नाम पर युवाओं को कट्टरपंथ की राह पर मोड़ने का काम करता था।
तीन हफ्तों तक चली गहन पूछताछ में यह सामने आया कि इरफान का सीधा संबंध जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और अंसार गजवत-उल-हिंद (AGH) जैसे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों से था। इरफान के मोबाइल फोन से पुलिस को कई चौंकाने वाले सबूत मिले, जिनमें पाकिस्तान में बैठे जैश के आतंकी उमर बिन खत्ताब के टेलीग्राम चैनल से सीधा संपर्क शामिल था।
यही डिजिटल सबूत वह धागा साबित हुआ, जिसने जाँच एजेंसियों को एक ऐसे ‘व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क‘ तक पहुँचा दिया, जो बाहर से शिक्षित और सभ्य दिखने वाले डॉक्टरों, मौलवियों और प्रोफेशनल्स की आड़ में देश के भीतर गहरी साजिश रच रहा था। इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों को झकझोर दिया, क्योंकि अब तक आतंक की परिभाषा बंदूकों और जंगलों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन यहाँ आतंक ‘डॉक्टरों के लैब कोट’ और ‘मौलवियों के उपदेश’ की ओट में पल रहा था।
डॉक्टरों की दुनिया में छिपा आतंक
मौलवी इरफान अहमद से मिली जानकारी ने पुलिस को एक चौकाने वाली दिशा दी। 3 पढ़े-लिखे डॉक्टरों तक पहुँचाया, जो अपने पेशे का पर्दा डालकर आतंक के असली मंसूबों में लिप्त थे। ये डॉ मुजम्मिल शकील (पुलवामा), डॉ आदिल अहमद राठर (कुलगाम) और डॉ शाहीना शाहिद (लखनऊ) थे।
पूछताछ में सामने आया कि ये डॉक्टर सिर्फ मरीजों का इलाज नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्होंने आतंकियों के लिए हथियार और बम बनाने की सामग्री जुटाने में सक्रिय मदद की थी। खुद को मेडिकल प्रोफेशनल दिखाकर उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल किया और किसी को शक होने से बचाया।
इन सभी का तार हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा था। यही वह जगह थी, जहाँ से पुलिस ने अब तक के सबसे बड़े विस्फोटक जखीरे में से एक बरामद किया। लगभग 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट, हथियार और बम बनाने की सामग्री, जो दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बड़े हमलों की योजना का हिस्सा हो सकती थी। यह खुलासा साफ कर देता है कि कैसे आतंक अब सिर्फ संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा और पेशेवर संस्थानों के भीतर भी छिपकर काम कर रहा है।
यूनिवर्सिटी से आतंक की लैब तक: शिक्षा का काला इस्तेमाल
जाँच में सामने आया कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी में कार्यरत डॉ मुजम्मिल शकील ने अपने पेशेवर माहौल का दुरुपयोग किया। उसने यूनिवर्सिटी की लैब उपकरणों और रिसर्च सामग्री का इस्तेमाल विस्फोटक तैयार करने के लिए किया। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया कि यूनिवर्सिटी में छिपाए गए RDX के सैंपल्स प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किए गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह तैयारी सिर्फ थिएरेटिकल नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी चल रही थी।
साथ ही, पहले अनंतनाग मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉ आदिल अहमद राठर को सहारनपुर से गिरफ्तार किया गया। उसके कॉलेज लॉकर की तलाशी में AK-47 राइफल और कारतूस बरामद हुए। यह दर्शाता है कि इन डॉक्टरों ने स्वयं को मेडिकल प्रोफेशनल के रूप में छुपाकर, आतंक के लिए उपकरण और हथियार इकट्ठा किए, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से शहरी और पेशेवर ढाँचे में घुसपैठ कर चुका था।
फरीदाबाद में बरामद 2,900 किलो विस्फोटक
जब पुलिस की टीम फरीदाबाद के धौज और फतेहपुर टगा गाँव में छापेमारी के लिए पहुँची, तो उन्हें वहाँ एक ऐसा खौफनाक जखीरा मिला कि सभी दंग रह गए। इन दो घरों से कुल 2,900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ, जो बड़े पैमाने पर विस्फोटक बनाने के लिए इस्तेमाल होता है।
सिर्फ इतना ही नहीं, पुलिस ने 20 टाइमर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, तार, रिमोट कंट्रोल, बैटरियाँ और धातु की चादरें भी जब्त कीं। ये सभी सामान IED तैयार करने में काम आते हैं, यानी किसी भी बड़े हमले की योजना के लिए पूरी तरह से तैयार सामग्री थी।
इसके अलावा, एक घर से AK-56 राइफल, क्रिंकोव राइफल, चीनी पिस्तौल और बरेटा गन जैसे भारी हथियार भी मिले। जाँच में पता चला कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान स्थित आतंकियों के निर्देशों पर काम कर रहा था और इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। इस खुलासे ने साफ कर दिया कि आतंक अब सिर्फ जंगली इलाकों या संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और शिक्षित माहौल में भी चुपचाप जाल बुन रहा है।
जाँच के बाद गिरफ्तारी का सिलसिला
मौलवी इरफान अहमद और तीन डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की कार्रवाई और व्यापक हुई। जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के अलग-अलग स्थानों से 8 और लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें आरिफ निसार, यासिर-उल-अशरफ, मकसूद अहमद, और जमीर अहमद आहंगर उर्फ मुतलशा शामिल थे।
जाँच में यह भी सामने आया कि मुतलशा एक पैन-इंडिया चैट ग्रुप ‘फर्जंदान-ए-दारुल उलूम देवबंद’ का सक्रिय सदस्य था। यह ग्रुप ऑनलाइन युवाओं को जिहाद के लिए मानसिक रूप से प्रेरित और कट्टरपंथ की ओर मोड़ने का काम करता था। सभी गिरफ्तार आरोपितों को UAPA की धारा 16 और 18 के तहत न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से न्यायिक नियंत्रण में आ गया।
दिल्ली तक कैसे पहुँची साजिश
जाँच में सामने आया कि फरीदाबाद से सटे इलाकों में विस्फोटक तैयार किए जा रहे थे और इन्हें दिल्ली में लाने की तैयारी थी। पुलिस को शक है कि इस नेटवर्क का मकसद दिल्ली या एनसीआर में बड़ा ब्लास्ट कराना था, ताकि सांप्रदायिक तनाव फैल सके। धौज में बरामद सामग्री से अनुमान है कि विस्फोटक पिछले दो वर्षों में धीरे-धीरे जुटाए गए थे।
फॉरेंसिक टीम ने मौके से मिले अवशेषों में अमोनियम नाइट्रेट फ्यूल ऑयल की मौजूदगी की पुष्टि की। यह वही केमिकल है जो फरीदाबाद में जब्त किए गए विस्फोटकों में भी पाया गया था। NIA और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल अब यह जाँच कर रही है कि क्या यह आत्मघाती हमला (फिदायीन ऑपरेशन) था।
क्या था मकसद और आगे का खतरा
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि डॉ उमर ने यह विस्फोट ‘घबराहट में किया गया हमला’ था। शक है कि फरीदाबाद में छापेमारी और डॉ मुजम्मिल की गिरफ्तारी के बाद उसने जल्दबाज़ी में धमाका कर दिया, ताकि साजिश उजागर होने से पहले कोई ‘प्रभावी वार’ किया जा सके। हालाँकि एजेंसियाँ यह भी जाँच कर रही हैं कि क्या दिल्ली मूल लक्ष्य थी, या यह धमाका किसी और बड़ी योजना का हिस्सा था।
ISIS-India की खौफनाक साजिश: खाना-पानी में जहर घोलने का प्लान
इसके अलावा, गुजरात ATS ने एक खौफनाक साजिश का पर्दाफाश करते हुए तीन आरोपितों ‘कैराना के आजाद सुलेमान शेख (20), लखीमपुर के मोहम्मद सुहैल (23) और एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया था, जिन पर खाने-पीने की वस्तुओं में घातक जहर (रिसिन) मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों को मारने और दहशत फैलाने का आरोप है।
उनके निशाने में एक RSS कार्यालय, दिल्ली का आजाद मार्केट और अहमदाबाद का फल बाजार थे और छापे में तीन पिस्तौल, 30 कारतूस और ज़हर बनाने में काम आने वाला अरंडी का तेल बरामद हुआ है। जाँच में यह नाता भी मिला है कि गिरोह ISIS-KP से जुड़ा था और उसे पाकिस्तानी हैंडलर ‘अब्दुल खदीजा’ से टेलीग्राम के जरिए निर्देश मिलते थे, इस समूह का नेटवर्क यूपी, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश तक फैला पाया गया है और अब ATS साइबर फोरेंसिक से मोबाइल-लैपटॉप की पड़ताल कर संदेश-लेनदेन और धन के स्रोत का पता लगा रही है क्योंकि खाने-पीने में जहर मिलाना छिपकर व्यापक नुकसान और सार्वजनिक भय पैदा करने की नीति है।
यह पूरी कहानी बताती है कि कैसे एक छोटा-सा सुराग, कुछ दीवारों पर चिपके पोस्टर, देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक ऐसे आतंकी नेटवर्क तक ले गया जो डॉक्टरों, मौलवियों और पढ़े-लिखे पेशेवरों के रूप में काम कर रहा था। इन लोगों ने ‘ज्ञान’ और ‘सेवा’ के नाम पर आतंक फैलाने की योजना बनाई थी।
अगर फरीदाबाद और कश्मीर में समय रहते छापेमारी न होती, तो दिल्ली एक बहुत बड़े हमले का शिकार हो सकती थी। फिलहाल, जाँच जारी है और देश की सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हैं, ताकि कोई और ‘व्हाइट कॉलर आतंकी’ समाज के भीतर से फिर न उभरे।







