नक्सलवाद के खात्मे का प्रण ले चुकी मोदी सरकार लगातार एक के बाद नक्सलियों को ढेर करती जा रही है। इस बीच बड़े-बड़े नक्सली हथियार छोड़कर देश की मुख्य धारा से भी जुड़ रहे हैं। हाल ही में एनडीटीवी के पावर प्ले में गृहमंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलियों के खात्मे की तारीख 31 मार्च 2026 बताई थी। साथ ही नक्सलियों को चेतावनी देते हुए माडवी हिड़मा को 30 नवंबर से पहले खत्म करने की भविष्यवाणी की थी।
12 दिन पहले मारा गया टॉप नक्सली हिड़मा
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षाबलों को मोस्ट वांटेड हिड़मा को खत्म करने के लिए 30 नवबंर 2025 तक का डेडलाइन तय किया था। लेकिन सुरक्षा बलों ने 12 दिन रहते अपना टारगेट पूरा कर लिया और 1 करोड़ का ईनामी हिड़मा मारा गया।
छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सीमा पर खूंखार नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया। हिड़मा पर 1 करोड़ का ईनाम था। नक्सल का हार्डकोर कमांडर माडवी हिड़मा के साथ 5 और नक्सली भी मारे गए हैं। इसमें उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का, बॉडीगार्ड देवे, लकमल, कमलू, मल्ल शामिल है। लाल आतंक के इस टॉप कमांडर के मारे जाने पर सुकमा में पटाखे फोड़कर लोगों ने जश्न मनाया।
आंध्रप्रदेश के डीजीपी ने ऑपरेशन की जानकारी देते हुए कहा, “अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारेदुमिल्ली में पुलिस और माओवादियों के बीच एनकाउंटर सुबह 6 से 7 बजे के बीच हुई। इसमें एक शीर्ष माओवादी लीडर समेत 6 माओवादी मारे गए।”
हमेशा बच कर निकल जाता था हिड़मा
नक्सली हिड़मा के जुड़े अभियान के दौरान सुरक्षाबलों ने 27 माओवादियों को हिरासत में लिया। घटनास्थल से एके47, 1 रिवॉल्वर, 1 पिस्टल बरामद किया गया है। कृष्णा जिले के पेनामलुरु पुलिस ने भी अभियान चलाया था।
इस अभियान के तहत सुकमा से सटे अल्लुरी सीताराम जिले के पास उसका एनकाउंटर किया गया। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सटा हुआ है। पुलिस को इस इलाके में नक्सलियों के छिपे होने की खबर मिली थी। सर्च ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। मंगलवार सुबह (17 नवंबर 2025) से ही नक्सलियों के साथ डीआरजी जवानों की मुठभेड़ चल रही थी, जिसके बाद टॉप नक्सली के मरने की खबर आई है।
बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को संभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिड़मा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसका काम तमाम कर दिया।
नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश , तेलंगाना, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे हिस्सों में घने जंगल हैं। इन क्षेत्रों में फोन नेटवर्क ठीक से काम नहीं करता है। ऐसे में सुरक्षाबलों को जानकारी मिलने के बाद जब तक अभियान शुरू किया जाता है, ये नक्सली नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा का भी यही हाल है। यहाँ मुखबिर ही काम आते हैं। ऐसे में हिड़मा का मारा जाना सुरक्षाबलों के लिए बड़ी कामयाबी है।
बीफ खाने का शौकीन था
अनुसूचित जनजाति का एकमात्र टॉप नक्सली 24 घंटे हथियारों के साथ सुरक्षा घेरे में रहता था। उसके दिन की शुरुआत सुबह 4 बजे हो जाती थी।पूरी यूनिट को वह व्यायाम करवाता था। फिर आगे की रणनीति के लिए योजना बनाता था। वह बीफ खाने का शौकीन था और शुगर की वजह चावल छोड़ दिया था और अब सिर्फ रोटी खाता था।
टेक्नोफ्रेंडली भी था नक्सली हिड़मा
टॉप नक्सली हिड़मा को तकनीक की अच्छी समझ थी। माओवादियों को वह तकनीक की जानकारी देता था। इसलिए सुरक्षाबलों के लिए वह ‘काल’ बन गया था। एनडीटीवी के मुताबिक, उसकी सुरक्षा 3 से 4 घेरे की होती थी। बाहरी घेरे को जैसे ही सुरक्षाबलों के आने का आभास होता था, वह उनसे भिड़ जाते थे। इस बीच हिड़मा भाग जाता था।
हिड़मा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।
झीरमघाटी अटैक का मास्टरमाइंड
झीरमघाटी में हिड़मा ने 2013 में हमला कर पूरे कॉन्ग्रेस नेतृत्व को खत्म कर दिया था। मारे गए नेताओं में पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल,उनके बेटे दिनेश पटेल, बीजापुर के नेता टाइगर महेन्द्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत 27 लोग शामिल थे। इस दौरान नक्सलियों ने टाइगर महेन्द्र कर्मा पर 100 से ज्यादा गोलियाँ बरसाई।
2021 में सुकमा- बीजापुर में सुरक्षाबलों पर हमला
3 अप्रैल 2021 को छत्तीसगढ़ के सुकमा-बीजापुर के घने जंगलों में सुरक्षाबलों ने ‘ऑपरेशन प्रहार’ के तहत नक्सलियों को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। इस दौरान घात लगाकर नक्सलियों ने कायराना हमला किया। इस हमले में 22 जवान बलिदान हो गए और 30 से ज्यादा घायल हो गए। इसमें सीआरपीएफ, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड और स्पेशल टास्क फोर्स के जवान थे।
दरअसल सुरक्षाबलों को जानकारी मिली थी कि माड़वी हिड़मा जंगलों में छिपा हुआ है। लेकिन ये जानकारी जानबूझकर नक्सलियों ने फैलाई थी। सुरक्षाबलों के पहुँचते ही 3 तरफ से करीब 250 नक्सलियों ने उन्हें घेर लिया और 4 घंटे तक गोलियाँ चलाई। इस दौरान ग्रेनेड और रॉकेट लॉन्चरों का भी इस्तेमाल किया गया था। नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के हथियार भी लूट लिए थे।
2010 दंतेवाड़ा हमले का मास्टरमाइंड
6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने 76 सीआरपीएफ जवानों को मार दिया था। ये जवान वहाँ रूटीन सर्च ऑपरेशन चला रहे थे। यूनिट के 150 जवान जंगल की तरफ गए। इन्हें अंदाजा नहीं था कि नक्सली वहाँ घात लगाकर इनका इंतजार कर रहे हैं।
ऊँची झाड़ियाँ और घुमावदार रास्ते का इस्तेमाल कर करीब 1000 वहाँ पहुँच कर तैयारी कर रहे थे। जब जवान वहाँ पहुँचे तो सब कुछ शांत था। सर्च ऑपरेशन कर जब ये लोग वापस लौट रहे थे, तभी तेज धमाका हुआ। जब तक वे संभल पाते, चारों ओर से अँधाधुंध फायरिंग शुरू हो गयी। इस दौरान 76 जवानों ने अपनी जान दे दी।
एक मात्र जनजातीय समुदाय था टॉप नक्सली था
हिड़मा का जन्म सुकमा के पुवाार्ती में 1981 में हुआ था। 1996 में मात्र 17 साल की उम्र में वह नक्सलियों से जुड़ गया। उसे हिड़मा हिदमल्लाडु और संतोष भी कहा जाता था। वह गोंड जनजाति समुदाय का था। इस इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था।
इसलिए उसके लिए निकलकर भागना और सुरक्षाबलों को साजिश में फँसाना आसान था। बड़े-बड़े नक्सली हमले की साजिश रचने के साथ साथ उसने खुद को बचाने के कई तरकीब आजमाए थे। लेकिन सरकार के प्रण के आगे उसकी तरकीब काम नहीं आई और सुरक्षाबलों ने उसे मार गिराया।







