देश में नक्सलवाद अब अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है। 2014 में जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, नक्सलियों के खिलाफ एक से बढ़कर एक ऑपरेशन किए गए। 2014 से पहले नक्सलियों के प्रति अपनाए गए ढूलमुल रवैये को त्याग कर केन्द्र सरकार ने बातचीत, सुरक्षा, समन्वय और ऑपरेशन पर आधारित नीति बनाई। इसका असर यह है कि बड़े बड़े नक्सली या तो सरेंडर कर रहे हैं या फिर सुरक्षाबलों के हाथों मारे जा रहे हैं।
गृहमंत्री अमित शाह की घोषित डेडलाइन से 12 दिन पहले माओवादी नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने मार गिराने में सफलता पाई। गृहमंत्री शाह ने देश से नक्सलियों के समूल नाश की डेडलाइन 31 मार्च 2026 रखा है। हिड़मा की मौत के बाद अब जनता ये उम्मीद लगाए बैठी है कि 2026 की पहली तिमाही बचे- खुचे नक्सलियों के लिए ‘काल’ साबित होगा।
हिड़मा की मौत, नक्सलवाद पर जबरदस्त प्रहार
आज की तारीख में, माओवादियों की ताकत काफी कम हो गई है। सबसे जवान सदस्य हिड़मा ही था, जिसकी समझ और तकनीक से नक्सलियों ने बड़े-बड़े हमले किए। उसके खात्मे ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।
अधिकांश नेता या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। कई नक्सलियों की उम्र हो चली है। कई वरिष्ठ माओवादी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। नेतृत्व का अभाव, वैचारिक तौर पर आकर्षण की कमी, नए लोगों का आना कम होना इसके ढ़हने में अहम भूमिका निभा रहा है। सुरक्षा बल हर नक्सली किले को भेद चुके हैं। संसाधनों की कमी है। यही वजह है कि नक्सली क्षेत्र अब गिनती के रह गए हैं।
गृहमंत्री शाह ने दिया सुरक्षाबलों को ‘टारगेट’
पिछले साल जब गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की तारीख मुकर्र की थी, तो इसका फायदा ये हुआ था कि सुरक्षाबलों को एक ‘गोल’ मिल गया था।
सुरक्षाकर्मियों ने कई इलाकों को नक्सल मुक्त कर एक कीर्तिमान रच दिया। एक के बाद एक क्षेत्र नक्सलमुक्त होते गए। कई नक्सली नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ सरेंडर किया। कई लोगों को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया।
इसी क्रम में नक्सलियों का फिलहाल सबसे बड़ा चेहरा हिड़मा था, जिसे खत्म करने के लिए गृहमंत्री शाह ने सुरक्षाबलों को 30 नवंबर 2025 तक का समय दिया था। इसे वक्त रहते पूरा कर लिया गया।
नक्सलवाद के खिलाफ मोदी सरकार ने उठाए कई कदम
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने नक्सलवाद पर लगाम कसने के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ बनाई। इसका असर ये हुए कि 2024 तक नक्सल से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आयी।
पिछले 10 सालों में नक्सल प्रभावित इलाकों में 576 पुलिस स्टेशन बनाए गए। इस दौरान नक्सल प्रभावित जिले 126 से घटकर 18 रह गए। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने सरेंडर किया और करीब 270 नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया गया।
नक्सलियों से मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 73% की कमी आयी। नक्सली हिंसा में मरने वाले आम नागरिकों की संख्या भी 70% कम हुई।
20 सालों में सबसे बड़ी कामयाबी है हिड़मा का खात्मा
लगभग तीन दशकों तक, माडवी हिड़मा का नाम बस्तर के जंगलों में खौफ का पर्याय था। माओवादियों का सबसे खूंखार कमांडर और संगठन के हर निर्णय में दखलंदाजी करने वाला वह एकमात्र आदिवासी नेता था।
अधिकारियों का मानना है कि उसकी मौत पिछले 20 सालों में माओवादियों के लिए सबसे बड़ा झटका है। वह न सिर्फ सुरक्षाबलों पर हुए बड़े-बड़े हमलों के लिए जिम्मेदार था, बल्कि कम उम्र और जंगलों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ ऐसा जनजातीय नेता था, जिसकी पकड़ संगठन पर सबसे ज्यादा थी। वह नक्सलियों के लिए प्रेरणा था।
हिडमा की कहानी सुकमा-बीजापुर सीमा पर बसे एक छोटे से गाँव पुवर्ती से शुरू होती है, जिसे कुछ साल पहले तक माओवादियों का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था।
1991 में वह 17 साल की उम्र में नक्सली संगठन से जुड़ा, करीब 3 दशक तक संगठन के साथ जुड़े रहने की वजह से उसे सब कुछ पता था। सुरक्षाबलों पर हुए ज्यादातर हमलों की रणनीति उसने बनाई। उसकी मौत हर दृष्टि से देश को राहत देने वाला है।
छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में उसका अच्छा खासा प्रभाव था। बस्तर के नक्सलियों में जनजातीय लोग ज्यादा हैं। नेताविहीन होने पर ये लोग अब सरेंडर करने के लिए मजबूर होंगे। हिड़मा पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का नेता था। 2009 से 2021 के बीच घात लगाकर किए गये सुरक्षाबलों पर हमले उसने किए।
इन हमलों में 2010 में हुआ ताड़मेटला हमला, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हुए। 2017 में बाँकुपारा का हमला। इसमें 12 सीआरपीएफ के जवान मारे गए। 2017 में हुआ बुर्कापाल का हमला जिसमें 25 सीआरपीएफ के जवानों की जान गई। 2021 में हुआ तेकुलगुडेम-पेडागेलुर का हमला, जिसमें 22 डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा जवानों ने बलिदानी दी।
इसके अलावा झीरम घाटी का वो हमला, जिसने छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस को नेतृत्वविहीन कर दिया था, हिड़मा की साजिश का नतीजा था। कुछ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने उसे ‘कसाई’ बताया है।
हर बार चकमा देकर भाग निकलता था हिड़मा
हिडमा को पकड़ने या मारने के लिए कई बड़े अभियान चलाए गए। भेज्जी और बुरकापाल हत्याकांड के बाद 2017 में शुरू किए गए ऑपरेशन प्रहार में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय बलों ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। कई दिनों तक, टीमें टोंडामरका के जंगलों में तलाशी लेती रहीं।
पुलिस का मानना था कि हिड़मा बुरी तरह घायल हो गया है, लेकिन कुछ महीनों बाद सुरक्षाबलों पर हुए हमले में उसका नाम आया।
2021 का तेकुलगुडेम मुठभेड़ एक और उदाहरण था। पुवर्ती के पास हिडमा की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिलने पर, सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी और एसटीएफ के लगभग 800 जवान इलाके में पहुँचे, लेकिन वे साजिश का शिकार हो गए। एक पहाड़ी पर तैनात हिडमा की बटालियन ने लगातार एलएमजी से गोलीबारी की, जिसमें 22 जवान मारे गए।
साल 2025 के शुरुआत में करेगुट्टा हिल्स में सबसे बड़े माओवादी-विरोधी अभियान में 25,000 जवानों को शामिल किया गया था। इस अभियान का मकसद भी हिड़मा को घेरना था। इस अभियान में 31 नक्सली मारे गए, लेकिन हिडमा एक बार फिर बच निकला।
इस बार आंध्र प्रदेश का पहाड़ी इलाका, उसका तीन लेयर का सुरक्षा घेरा और हथियार उसे नहीं बचा पाया और सुरक्षाबलों ने हिड़मा के साथ उसकी पत्नी राजे, बॉर्डीगार्ड और तीन नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया।
सुरक्षाबलों ने पिछले 10 सालों में जनजातीय समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाई है। इन क्षेत्रों में विकास की पहुँच हो गई है। कई पुलिस थाने ऐसे इलाकों में बन गए हैं और सबसे बड़ी बात वैचारिक तौर पर कमजोर नक्सलियों से जुड़ने के लिए नई पीढ़ी तैयार नहीं है। यही वजह है कि 2026 में नक्सलियों के खात्मे की तैयारी देश कर चुका है।







