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एक और बाबरी, एक और 6 दिसंबर: हिंदू आस्था के अपमान की यह मुगलिया सोच नए भारत में क्यों चले, सदियों पुराने जख्मों पर नमक रगड़कर क्या हासिल करेगी TMC?

अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर उनके भव्य मंदिर का पुनर्निमाण करने के लिए हिंदुओं ने 500 वर्षों से अधिक का लंबा संघर्ष किया। इस संघर्ष के दौरान यह धरती राम भक्तों के लहू से लाल भी हुए लेकिन अपने आराध्य को मंदिर में देखने के सपने के सामने भक्तों को हर बलिदान छोटा लग रहा था। 500 सौ वर्षों तक हिंदुओं ने अन्याय, दमन और अपमान को सहते हुए भी प्रभु राम के प्रति अपनी श्रद्धा को टूटने नहीं दिया और कानूनी लड़ाई लड़ अपने आराध्य का भव्य मंदिर बनवा दिया।

इस संघर्ष की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि अयोध्या में मौजूद भगवान राम के मंदिर को तोड़कर वहाँ मुगलिया आक्रांताओं ने ‘बाबरी’ खड़ी कर दी थी। यह ना सिर्फ हिंदू आस्था पर चोट थी बल्कि इसे मजहबी वर्चस्व का प्रतीक बनाकर सदियों तक हिंदुओं के घावों को हरा रखा गया। आखिरकार, मुस्लिम आक्रांताओं की इस हिंदू विरोधी मानसिकता की इस पहचान को 6 दिसंबर 1992 को राम भक्तों ने जड़ से उखाड़ फेंका।

प्रभु राम का भव्य मंदिर बनकर तैयार है और आगामी 25 नवंबर को वहाँ धर्म ध्वजा स्थापित करने की तैयारी है। दूसरी और अयोध्या से 850 किलोमीटर दूर एक बाबरी बनाने की तैयारी चल रही है। इसके लिए दिन चुना गया है- 6 दिसंबर।

ममता बनर्जी की पार्टी TMC के विधायक हुमायूँ कबीर ने मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर को ‘बाबरी नाम की मस्जिद’ की नींव रखे जाने का ऐलान किया है। हुमायूँ कबीर का कहना है कि इसे बनने में तीन साल लगेंगे। अगर किसी को इसका शक भी हो कि इस नई मस्जिद का उस पुरानी बाबरी से कोई लेना-देना नहीं है तो कबीर ने यह भी साफ कर दिया है कि यह उसी का ‘सेंटीमेंट’ यानी भाव है।

हुमायूँ कबीर का कहना है कि बाबर ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाई और यह ऐतिहासिक मुस्लिम सेंटीमेंट है। उनका कहना है, “बंगाल में 35-37% मुस्लिम आबादी और मुर्शिदाबाद में 72% है और इसलिए उनका ‘सेंटीमेंट’ है कि उनकी जो 6 दिसंबर को अयोध्या में मस्जिद तोड़ी गई वो मुस्लिमों के मन में अभी भी है।”

बंगाल में आने वाले 6 महीनों के भीतर विधानसभा चुनावों का एलान किए जाने की संभावना है और इसी को देखकर हुमायूँ के इस बयान को मुस्लिम वोटों के तुष्टीकरण की साजिश के तौर पर देखा जा रहा है। चुनावों से ठीक पहले TMC किसी भी तरह मुस्लिम आबादी को अपने पक्ष में लाने की पुरी कोशिश करती नजर आने लगी है। चाहे इसके लिए हिंदुओं की आस्था पर प्रहार ही क्यों ना करना पड़े।

TMC के साथ कॉन्ग्रेस भी वोटों की इस दौड़ में शामिल हो गई है। यह जानते हुए भी कि यह TMC की तुष्टिकरण की नीति है, कॉन्ग्रेस खुलकर उसके साथ है। कॉन्ग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि इसमें कुछ विवादित नहीं है, इसको विवाद का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है।

सुरेंद्र राजपूत कोई नौसिखिया तो हैं नहीं, टीवी पर कॉन्ग्रेस का लंबा समय से पक्ष रख रहे हैं और राजनीतिक चालबाजियों को अच्छी तरह से जानते समझते हैं। 6 दिसंबर की तारीख पर बाबरी बनाने के एलान के मायने क्या हैं इसमें अगर सुरेंद्र राजपूत को कुछ विवादित नहीं दिख रहा है तो साफ है कि उन्होंने अपने आँखों पर राजनीतिक पट्टी बाँध ली है।

भारतीय राजनीति में तुष्टिकरण कोई नई बीमारी नहीं है लेकिन TMC ने इसे जिस स्तर तक गिराकर ले जाने की कोशिश की है, वह देश की सामाजिक एकता के लिए सीधा-सीधा खतरा भी बन सकता है। मुस्लिम वोटों की ठेकेदार बन चुकी यह पार्टी उस रास्ते पर उतर आई है, जहाँ वोटों के लालच में हिंदुओं की भावनाओं और आस्था को बार-बार कुचला जा रहा है।

इस मामले में TMC की रणनीति साफ है कि बहुसंख्यक हिंदुओं को उकसाओ, उनकी आस्था का मजाक बनाओ और फिर खुद को ‘अल्पसंख्यकों का रक्षक’ बताकर मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में खड़ा करो। इसके लिए देश पर तलवार के दम पर हुकूमत करने, मंदिर तोड़ने और हिंदुओं के अस्तित्व को मिटाने की कोशिश करने वाले मुगलों को रोमैन्टिसाइज करने में भी नेताओं को कोई गुरेज नहीं है।

हिंदुओं की आस्था और भावनाओं को चोट पहुँचाने का सिलसिला लगातार और योजनाबद्ध तरीके से चलाया गया है। चाहे वह राम मंदिर का विरोध हो, जय श्रीराम बोलने पर हिंसा हो, दुर्गा विसर्जन पर प्रतिबंध हो या मुगल महिमामंडन, हर घटना इस बात का सबूत है कि बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को जानबूझकर उकसाने के प्रयोग बार-बार किए जा रहे हैं।

सदियों से हिंदू समाज बाहरी और अंदरूनी दोनों प्रकार के संघर्षों से लड़ता आया है। लेकिन सबसे खतरनाक लड़ाई वह होती है जिसमें दुश्मन सामने से नहीं बल्कि भीतर से हमला करे। TMC की यह राजनीति उसी प्रकार का हमला है। जब किसी समाज की आस्था पर प्रहार किया जाता है, तो वह समाज अपनी पहचान खोने लगता है।

यह देश के लिए इसलिए भी खतरनाक हो सकती है क्योंकि जब हिंदू-विरोधी और कट्टरपंथी राजनीति का सामान्यीकरण किए जाएगा तो इसका परिणाम समाजिक तनाव के रूप में सामने आएगा। मजहबी ध्रुवीकरण कोशिश होगी और यह आगे चलकर कितना खतरनाक रूप दिखाएगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

यह दौर नए और विकसित होते भारत के और सशक्त बनने का है और इसके लिए देश को तुष्टिकरण की सड़ी-गली राजनीति से बाहर निकलना होगा। TMC जैसी पार्टियाँ भारत को आगे नहीं ले जा रहीं बल्कि वे उन घावों को फिर से कुरेद रही हैं जिनसे निकलने में हिंदू समाज को सदियों लगे हैं। वोट बैंक की आड़ या कहें कि भूख में जो खेल खेलने की कोशिश की जा रही है वो पूरी भारतीय सभ्यता के खिलाफ है।

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