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दिल्ली हिंदू-विरोधी दंगा केस में SC ने देखे सबूत, शरजील के भाषण, प्लानिंग-सत्ता परिवर्तन की साजिश: सरकार ने बताया अंतरराष्ट्रीय साजिश

दिल्ली के फरवरी 2020 एंटी-हिंदू दंगों से जुड़े UAPA केस (FIR 59/2020) में सुप्रीम कोर्ट में जमानत सुनवाई तेज हो गई। उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा समेत सात आरोपित जमानत माँग रहे हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट जमानत याचिका कई बार खारिज कर चुकी हैं।

पुलिस का आरोप है कि ये दंगे अचानक नहीं हुए, बल्कि CAA विरोध प्रदर्शनों की आड़ में संगठित ढंग से प्लान किए गए थे। ताकि ट्रंप की विजिट के दौरान भारत की छवि खराब हो। ASG एस वी राजू ने कहा, “ये अचानक हिंसा नहीं, बल्कि रेजीम चेंज ऑपरेशन था।”

यह केस UAPA के तहत दर्ज FIR 59/2020 से शुरू हुआ था, जिसे बड़ी साजिश का मामला माना गया। आरोपितों पर आरोप है कि इन्होंने CAA-NRC के विरोध प्रदर्शनों को एक कवर की तरह इस्तेमाल करके हिंसा की प्लानिंग की। उसे भड़काया और फंडिंग करवाया।

पुलिस के अनुसार, इस पूरी योजना का उद्देश्य दंगों को इस तरीके से अंजाम देना था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब हो और यह सब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2022 में उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि चार्जशीट के शुरुआती अध्ययन से ही यह लगता है कि दंगे अचानक हुए हादसे नहीं थे, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत की गई थी, जिसमें उमर की अहम भूमिका है।

इसके बाद अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के हिसाब से आरोप इतने गंभीर हैं और शुरुआती जाँच में सही लगे हैं कि जमानत नहीं दी जा सकती।

2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट की एक और डिवीजन बेंच ने उमर खालिद, शरजील इमाम और बाकी आरोपितों की जमानत याचिकाएँ खारिज करते हुए कहा कि यह हिंसा किसी सामान्य झड़प का नतीजा नहीं था, बल्कि एक योजनाबद्ध प्रक्रिया का हिस्सा था। हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष की थ्योरी एक संगठित नेटवर्क और समयबद्ध प्लानिंग की ओर इशारा करती है।

अब सुप्रीम कोर्ट में आरोपित यह दलील दे रहे हैं कि उनके खिलाफ हिंसा में शामिल होने का कोई सबूत नहीं है। उनका कहना है कि कुछ लोग दंगों के समय नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे।

वे यह भी कहते हैं कि केस ज्यादातर व्हाट्सअप ग्रुप की चैट, देर से मिले प्रोटेक्टेड गवाहों के बयान और उन भाषणों पर टिका है जो उनके अनुसार सिर्फ CAA-NRC के खिलाफ राजनीतिक विरोध और सरकार की आलोचना थे, जिन्हें अपराध नहीं माना जा सकता।

इसके मुकाबले दिल्ली पुलिस का कहना है कि मामला सिर्फ नारेबाजी या अव्यवस्थित प्रदर्शन का नहीं है, बल्कि एक गहरी और पहले से तय की गई साजिश का है। पुलिस के अनुसार, CAA विरोध प्रदर्शनों को हिंसा फैलाने के लिए एक सॉफ्ट कवर बनाया गया, जिसमें पूरी प्लानिंग, समन्वय और फंडिंग शामिल थी। उनकी दलील है कि यह सब देश की संप्रभुता और राज्य की शक्ति को चुनौती देने वाली गंभीर मंशा के साथ किया गया।

सरकार बदलने का ऑपरेशन चला रहे थे आरोपित

सुप्रीम कोर्ट में अब तक अभियोजन पक्ष ने साफ तौर पर यह कहा है कि फरवरी 2020 की हिंसा कोई अचानक भड़की भीड़ नहीं थी, बल्कि पहले से की गई साजिश का नतीजा थी। राज्य की तरफ से पेश हो रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस वी राजू ने कोर्ट में दो बातें जोर देकर रखीं।

पहली यह कि आरोपितों को निर्दोष एक्टिविस्ट या बौद्धिक वर्ग के लोग बताने वाली कहानी गलत है और दूसरी यह कि आरोपितों के भाषणों, व्हाट्सऐप चैट और पूरी टाइमलाइन से साफ दिखता है कि दिल्ली को ठप करने, ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अशांति दिखाने और यहाँ तक कि रेजीम चेंज ऑपरेशन जैसी कोशिशों की एक बड़ी प्लानिंग थी।

20 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई में शरजील इमाम के भाषण और इस पूरी साजिश की वैचारिक सोच मुख्य चर्चा का विषय रहे। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच के सामने ASG राजू ने कई वीडियो क्लिप चलाए।

इन क्लिप्स में शरजील इमाम देशभर में चक्का जाम कराने, दिल्ली को घुटनों पर लाने और सिलिगुड़ी कॉरिडोर जिसे चिकन नेक भी कहा जाता है, उसको निशाना बनाने की बात करते सुनाई देते हैं। यह कॉरिडोर उत्तर-पूर्व को बाकी भारत से जोड़ने वाला बेहद रणनीतिक रास्ता है।

जो वीडियो सुप्रीम कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने चलाया, वही वीडियो सबसे पहले ऑपइंडियाने एक्सक्लूसिव रूप से जारी किया था।

EXCLUSIVE! Delhi Riot bail hearingASG Raju plays a video of Sharjeel Imam speeches. Imam referred to CAA, NRC and Kashmir. He spoke about Chakka Jam, incited violence, urging Muslims to take to streets. He spoke about cutting off Chicken’s Neck and NEVideo played in SC pic.twitter.com/FFsl1hDzin— OpIndia.com (@OpIndia_com) November 20, 2025

प्रोफेशन छोड़कर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। राज्य का कहना है कि ऐसे शिक्षित लोग, जिन्हें सरकारी खर्च पर पढ़ाया गया, जब अपनी क्षमता और पहुँच का इस्तेमाल अवैध कामों के लिए करते हैं, तो वे उन लोगों से कहीं अधिक खतरनाक हैं जो सिर्फ पत्थर फेंकते हैं या सड़क पर छोटे स्तर पर हिंसा करते हैं।

अभियोजन पक्ष का मुख्य तर्क यह है कि प्रताड़ित बुद्धिजीवी वाली कहानी हकीकत नहीं है। रिकॉर्ड बताता है कि यह जानबूझकर की गई उकसाहट, जरूरी सप्लाई रोकने की कोशिश और प्रदर्शन स्थलों को बड़े नेटवर्क के नोड की तरह इस्तेमाल करने की योजना थी।

व्हाट्सऐप चैट का सबूत भी इस मामले में बड़ा हिस्सा निभा रहा है। ASG राजू ने कोर्ट को कई ग्रुप्स की बातचीत दिखाई जैसे दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (DPSG), मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ JNU (MSJ), जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) और अन्य।

राज्य के मुताबिक ये सिर्फ अनौपचारिक स्टूडेंट फोरम नहीं थे, बल्कि समन्वय केंद्र थे, जहाँ पैसों की व्यवस्था, प्रदर्शन स्थलों की मरम्मत, चक्का जाम प्लान करना और मीडिया नैरेटिव प्रभावित करने जैसी चर्चाएँ होती थीं।

ASG के अनुसार, इन चैट्स को भाषणों और जमीन पर हुई घटनाओं के साथ मिलाकर देखें तो यह साफ होता है कि आरोपित आयोजक और प्लानर थे, न कि भीड़ में खड़े सामान्य लोग। उन्होंने बंद कमरे वाली, एन्क्रिप्टेड चैट्स के माध्यम से ऐसी योजना बनाई जो तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दिल्ली यात्रा के दौरान देशभर में तनाव बढ़ाने की कोशिश थी।

राज्य का कहना है कि दिल्ली पुलिस के हलफनामे में आया शब्द रेजीम चेंज ऑपरेशन ठीक उसी मंशा को दिखाता है, जो इन बातचीतों, भाषणों और प्लानिंग से सामने आती है, यानी चुनी हुई सरकार को कमजोर दिखाना, राजधानी को अराजक बनाना और दुनिया के सामने भारत को आग में झुलसता हुआ दिखाना।

ऑपइंडिया ने DPSG व्हाट्सऐप ग्रुप का वह मैसेज भी एक्सक्लूसिव रूप से सामने लाया था, जिसमें दंगों और प्रदर्शन को एक बड़े रेजीम चेंज ऑपरेशन की तैयारी बताया गया था और इस ग्रुप में सभी कथित सह-साजिशकर्ता मौजूद थे।

यह मैसेज राहुल रॉय ने 20 जनवरी 2020 को भेजा था, यानी दिल्ली के हिन्दू विरोधी  दंगों से पूरे एक महीना पहले। इस मैसेज में राहुल रॉय ने साफ लिखा था कि चल रहे प्रदर्शन दरअसल एक बड़े रेजीम चेंज ऑपरेशन की शुरुआत हैं और इस पूरी योजना को जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) आगे बढ़ा रही है।

सुनवाई के दौरान बेंच ने ASG एस वी राजू से पूछा कि क्या जमानत सुनवाई में पुरी जानकारी देखना जरूरी है। इस पर राजू ने शांत और साफ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष (डिफेंस) कोशिश कर रहा है कि बहस में देरी हो, ताकि यह तस्वीर बनाई जा सके कि ये लोग निर्दोष आंदोलनकारी हैं जो बिना वजह जेल में पड़े हैं।

लेकिन अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी यह दिखाना है कि पहली नजर में यह एक गंभीर और बड़ी साजिश थी। UAPA की धारा 43D(5) के अनुसार, अगर अदालत को यह मानने के लिए उचित आधार मिल जाए कि आरोप सही हो सकते हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती।

जमानत के दौरान अदालत का काम सिर्फ यह देखना होता है कि क्या सबूत इस शुरुआती कसौटी को पूरा करते हैं, ना कि हर सबूत की गहराई से जाँच वैसे ही करना जैसे ट्रायल में किया जाता है। इसी वजह से, ASG राजू ने कहा कि वीडियो चलाना और बातचीत दिखाना जरूरी है, ताकि यह साबित हो सके कि मामला सिर्फ राजनीतिक विरोध या कमजोर सबूतों पर नहीं टिकता, बल्कि सामग्री गंभीर है।

अपनी दलील को मजबूत करने के लिए ASG राजू ने एक और वीडियो दिखाया, जिसमें यह दिखाई देता है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ कैसे संगठित तरीके से इकट्ठी हुई और कैसे इसी माहौल में कांस्टेबल रतन लाल की हत्या हुई।

उन्होंने CCTV फुटेज दिखाकर बताया कि कैसे दंगाइयों ने पहले से योजना बनाकर कैमरों को ढका, जो कैमरे ऊँचाई पर थे उन्हें तोड़ दिया या नुकसान पहुँचाया और उसके बाद कैमरों के बंद हो जाने पर हिंसा शुरू कर दी। इस वीडियो को ऑपइंडिया ने चार्जशीट के आधार पर दोबारा तैयार किया था और वही वीडियो कोर्ट को दिखाया गया।

Important Delhi Riots EXCLUSIVE update 🚨 The video feed of the bail hearing in SC was disrupted. But our reporter has informed us of a video played by ASG SV Raju showing how cameras were disrupted, the mobilisation of the mob, and the diversion of CCTV right before the first… pic.twitter.com/H87eKX7v0R— OpIndia.com (@OpIndia_com) November 21, 2025

सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान ASG एस वी राजू ने उस दलील का भी जवाब दिया जिसमें कहा जा रहा था कि आरोपित करीब पाँच साल से जेल में हैं, इसलिए उन्हें जमानत मिलनी चाहिए।

ASG राजू ने ट्रायल कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर बताया कि मामले में हुई देरी का बड़ा कारण खुद आरोपितों की तरफ से लिए गए बार-बार के स्थगन (कार्यवाही को रोकने) और लंबी-लंबी दलीलें हैं, न कि पुलिस या अभियोजन की धीमी कामगिरी।

उन्होंने कहा कि कई बार ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में लिखा है कि बचाव पक्ष के वकील हफ्तों तक समय माँगते रहे। इसी संदर्भ में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सलीम खान फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों में साढ़े पाँच साल की कैद भी जमानत का स्वचालित आधार नहीं है।

अगले दिन ASG राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच के सामने अपनी दलीलें जारी रखीं। उन्होंने तथ्य और UAPA की कानूनी धाराओं को जोड़कर बताया कि UAPA की धारा 43D(5) में जो कठोर जमानत मानदंड हैं, वे इस मामले पर पूरी तरह लागू होते हैं।

उन्होंने फिर याद दिलाया कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कैसी हिंसा हुई पेट्रोल बम, एसिड जैसी चीजें, पत्थर, डंडे और पुलिस व आम लोगों पर हमले। 53 लोगों की मौत हुई और 530 से ज्यादा लोग घायल हुए।

CCTV कैमरों को पहले से प्लानिंग करके तोड़ा गया, पुलिस पर निशाना साधा गया और स्थान ऐसे चुने गए जहाँ से शहर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सके। उन्होंने साफ कहा यह कोई अचानक हुई भिड़ंत नहीं थी, बल्कि सोच-समझकर रची गई योजना थी।

इसके बाद उन्होंने UAPA की धारा 16(1)(a) (जिसमें आतंकी गतिविधि की परिभाषा है) और धारा 43D(5) का हवाला देकर इस सारे घटनाक्रम को आतंकी गतिविधि से जोड़ा। उन्होंने कहा कि कोर्ट पहले ही चार्जशीट स्वीकार कर चुका है, जिसमें UAPA सेक्शन 16 लगाया गया है और आरोपितों ने उस आदेश को कभी चुनौती भी नहीं दी।

इसलिए, उन्होंने कहा, “जब एक कोर्ट पहले ही कह चुकी है कि UAPA का अपराध बनता है, तो जमानत देने का सवाल ही नहीं उठता।” फिर ASG ने साजिश के खास पहलुओं पर बात की।

उनका कहना था कि आरोपित जान-बूझकर दिल्ली की सप्लाई दूध, पानी, सब्ज़ी आदि बंद करवाना चाहते थे, ताकि शहर ठप हो जाए और राज्य की क्षमता पर सवाल उठे। राज्य की तरफ से यह भी कहा गया कि दंगों में बम, पेट्रोल बम और हथियारों का इस्तेमाल हुआ, जो ‘आतंकी गतिविधि’ की श्रेणी में आता है।

उन्होंने सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) का भी उल्लेख किया और कहा कि सबूतों के अनुसार उत्तर-पूर्व भारत को देश से काटने की योजना भी बातचीत में दिखाई देती है। ASG ने बताया कि यह सामग्री चार्जशीट के साथ दी गई पेन ड्राइव में है और आरोपितों ने इसे कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए उनकी कोई सबूत नहीं है वाली दलील कमजोर पड़ जाती है।

इसके बाद उन्होंने आरोपितों की व्यक्तिगत भूमिका समझाई। उन्होंने पूरक आरोप पत्र पढ़कर बताया कि अभियोजन के मुताबिक उमर खालिद सिर्फ एक प्रदर्शनकारी नहीं थे, बल्कि चक्का जाम की योजना बनाने वालों में आगे थे।

ASG के अनुसार, उमर खालिद ने शरजील इमाम और आसिफ इकबाल तन्हा को समझाया था कि साधारण धरने और चक्का जाम में क्या फर्क है और उन्हें अलग-अलग इलाकों में चक्का जाम शुरू करने की जिम्मेदारी दी थी। राज्य का दावा है कि चक्का जाम शांतिपूर्ण विरोध नहीं, बल्कि शहर को ठप करने की हिंसक रणनीति थी।

ASG राजू ने 164 CrPC के तहत दर्ज प्रोटेक्टेड विटनेस के बयानों का भी हवाला दिया, जिसमें पैसे के लेन-देन और प्लानिंग का जिक्र है। उन्होंने कहा कि एक बयान में बताया गया कि आरोपित मीरान हैदर ने दंगों के लिए 2.86 लाख रुपए खर्च किए। उन्होंने यह भी कहा कि ED की जाँच में और भी बातें सामने आई हैं, लेकिन वे अभी सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड पर ही निर्भर हैं।

साजिश से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को समझाते हुए ASG ने साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 10 का जिक्र किया। इस धारणा के अनुसार, एक बार अगर साजिश होने की पर्याप्त संभावना दिख जाए, तो साजिश के दौरान किसी एक आरोपित की कही या की गई बात बाकी आरोपितों के खिलाफ भी पढ़ी जा सकती है।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी आरोपित का हर दंगे की जगह पर मौजूद होना जरूरी नहीं अगर उसने प्लानिंग, फंडिंग या विचार देने में भूमिका निभाई, तो वह उतना ही जिम्मेदार है।

डिजिटल सबूतों की तरफ बढ़ते हुए ASG ने व्हाट्सऐप चैट्स का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि चैट्स से साफ दिखता है कि शांतिपूर्ण विरोध चाहने वालों और हिंसक रास्ता चाहने वालों में फूट थी और याचिकाकर्ता उस गुट में थे जो टकराव और हिंसा चाहता था।

ASG ने राज्य का केस समेटते हुए कहा कि यह एक ऐसी साजिश थी जिसमें हत्या, आतंकी गतिविधियाँ और रेजीम चेंज जैसे दंगे शामिल थे, कुछ वैसा जैसा बांग्लादेश या नेपाल में हुआ था।

इसके बाद उन्होंने ‘parity’ और ‘delay’ पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अन्य आरोपितों को मिली जमानत का लाभ ये आरोपित नहीं उठा सकते, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि वे आदेश मिसाल नहीं हैं। देरी पर उन्होंने कहा कि ट्रायल में ज्यादा समय रक्षा पक्ष की वजह से लगा है और अगर आरोपित सहयोग करें तो वह दो साल में मुकदमा पूरा करवा सकते हैं।

बेंच ने भी कुछ स्पष्टीकरण माँगे। जब पूछा गया कि कितने गवाहों के 164 बयान दर्ज हैं, ASG ने बताया 47 में से 38 गवाहों ने बयान दिया है, जो साजिश के पक्ष में मजबूत गवाही मानी जा सकती है।

जब बचाव पक्ष ने अगली तारीख आज यानि सोमवार (24 नवंबर 2025) को सुने जाने का अनुरोध किया, ASG ने कहा कि वे मेरिट्स पर बहस नहीं कर सकते, क्योंकि पहले उन्होंने खुद कहा था कि वे मेरिट्स पर बहस नहीं करेंगे।

लेकिन बेंच ने साफ किया कि वे बचाव पक्ष को बहस से रोका नहीं जा सकता और चाहें ASG मौजूद हों या नहीं डिफेंस की बहस सुनी जाएगी। आज जो अगली सुनवाई 24 नवंबर 2025 को होनी है, उसमें बचाव पक्ष अपनी दलीलें पेश करेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

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