अमेरिकी वित्त विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने हाल ही में ईरान के तेल नेटवर्क के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत उन फ्रंट कंपनियों और शिपिंग नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए हैं जो ईरानी सशस्त्र बलों को कच्चे तेल की बिक्री से वित्तीय मदद पहुँचाते हैं। इनमें 17 वैश्विक कंपनियों और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिनमें भारत की एक शिपिंग कंपनी भी शामिल है।
असल में यह कार्रवाई अमेरिका की ईरान के खिलाफ लगातार बढ़ती दबाव नीति का हिस्सा है, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य गतिविधियों को रोकना है। सोचने वाली बात ये है कि ईरान के साथ डील अमेरिका के लिए इतनी बड़ी चिंता का विषय क्यों है।
अमेरिका ने पिछले समय में किन-किन संगठनों पर प्रतिबंध लगाए और अमेरिका व पश्चिमी देशों की चिंता क्या है, आइए इसके बारे में सबकुछ विस्तार से जानते हैं।
अमेरिका की नई कार्रवाई के पीछे क्या है विवाद?
इजरायल के साथ हुई 12-दिन की जंग में हार के बाद ईरानी सेना अपने वार्षिक बजट को पूरा करने और कमजोर हो चुकी सेनाओं को फिर से खड़ा करने के लिए कच्चे तेल की बिक्री पर और अधिक निर्भर हो गई है।
इस कारण से अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने ईरान के ‘शैडो ऑयल नेटवर्क’ के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाए हैं। इस नेटवर्क के जरिए ईरान अपने तेल को दुनिया भर में बेचता है और इससे मिलने वाली आय अपने परमाणु कार्यक्रम और सैन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करता है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस कार्रवाई पर कहा, “ये कार्रवाई अमेरिकी ट्रेजरी के उस अभियान का हिस्सा है जिसका मकसद ईरानी शासन को परमाणु हथियार विकसित करने और आतंकी संगठनों को समर्थन देने के लिए मिलने वाली फंडिंग को रोकना है। ईरानी शासन की आय को बाधित करना उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित करने के लिए बेहद जरूरी है।”
अमेरिका का दावा है कि ईरान के इस तेल नेटवर्क के जरिए उसके सैन्य बजट में भारी इजाफा हो रहा है। इजरायल के साथ जंग में ईरान की सेना को भारी नुकसान हुआ था जिसके लिए वह तेल बिक्री से आने वाले पैसों पर काफी अधिक निर्भर है।
इस नेटवर्क में ईरान की सेना के तेल बिक्री विंग ‘सेपेहर एनर्जी जहान’ का अहम योगदान है। यह कंपनी अपने तेल को बेचने के लिए फ्रंट कंपनियों और शैडो फ्लीट यानी छिपे हुए जहाजों का इस्तेमाल करती है।
इन जहाजों के जरिए ईरान अपने तेल को दुनिया भर में भेजता है, जिससे उसकी आय बढ़ती है। अमेरिका ने इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए अब तक 170 से ज्यादा जहाजों पर प्रतिबंध लगा चुका है।
शैडो फ्लीट क्या है?
शैडो फ्लीट को डार्क फ्लीट भी कहा जाता है। ये ऐसे टैंकरों और सहायक जहाजों का समूह है जो धोखाधड़ी वाले शिपिंग तरीकों पर निर्भर रहते हैं। इनका मकसद होता है प्रतिबंधित या हाई रिस्क (उच्च-जोखिम) वाले माल को इस तरह ले जाना कि उसकी असली उत्पत्ति, मालिकाना हक या पहुँचने वाली जगह का नाम छिपा रहे।
2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह नेटवर्क तेजी से बढ़ा और इसके साथ ही एक नई कैटेगरी ‘ग्रे फ्लीट’ सामने आई। इसमें वे जहाज आते हैं जिनमें रूस से जुड़े जोखिम का पता भी चलता है, लेकिन उन पर अब तक औपचारिक रूप से प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
विंडवार्ड की ग्रे फ्लीट सूची उन जहाजों को बताती है जिनके पैटर्न रूस-संबंधी गतिविधियों से जुड़े होते हैं। इसमें मालिकाना हक में बदलाव, सामान्य से हटकर व्यापारिक मार्ग, या फिर उच्च-जोखिम वाले बंदरगाहों की सूची शामिल हो सकती है।
इन जहाजों को यूँ ही असुरक्षित नहीं माना जाता, बल्कि सूची में शामिल होने का मतलब है कि इनके साथ व्यापार करने से पहले अतिरिक्त जाँच, दस्तावेजों की पुष्टि और सावधानी बरतनी जरूरी है।
ग्रे फ्लीट में शामिल होना एक गतिशील मॉडलिंग प्रक्रिया है जो जहाजों के व्यवहार पर आधारित होती है, न कि किसी कानूनी निर्णय पर। यह समय के साथ बदलती रहती है- जैसे-जैसे जहाजों का मालिकाना हक बदलता है, उनके व्यापारिक पैटर्न में भी बदलाव आता है और नए जोखिम संकेत सामने आते हैं।
शैडो फ्लीट किस तरह काम करता है?
शैडो फ्लीट में काम करने वाले जहाज अक्सर ऑटोमैटिक आईडंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) ट्रांसपोंडर को बंद कर देते हैं (AIS-off), जिससे उनकी लोकेशन और गतिविधि छुप जाती है। इस धोखाधड़ी वाले शिपिंग तरीके के तहत जब AIS बंद होता है तो जहाज ट्रैकिंग या रडार से गायब हो जाते हैं। इससे पोर्ट अथॉरिटी भी उन्हें आसानी से ढूंढ नहीं सकती।
इसके अलावा अधिकतर शैडो फ्लीट में पुराने, रिटायर्ड या स्क्रैप के लिए नामित टैंकरों को नई-नई शेल कंपनियों के नाम पर खरीद लिया जाता है। इनकी मालिकाना जानकारी बदल दी जाती है या फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। ये अक्सर कमजोर रेगुलेशन वाले देशों जैसे पनामा, कुक आइलैंड्स, लाइबेरिया, आदि के झंडे (फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस- flag of convenience) का इस्तेमाल करते हैं। एक ही जहाज बार-बार देश का झंडा बदल देता है, जिससे उसकी पहचान छुप जाती है।
ये जहाज अफ्रीका, मिडिल ईस्ट या साउथ अमेरिका जैसे देशों के दूर- दराज इलाकों में एक दूसरे जहाज से माल लेते हैं। इसका मकसद होता है कागजों में ‘ऑरिजिन’ छुपाना ताकि माल का पता न चले कि वह ईरान, रूस या किसी और बैन वाले देश से आया है। यह प्रक्रिया भी कई बार AIS बंद करके की जाती है।
इसके अलावा शैडो फ्लीट के तहत डॉक्यूमेंटेशन और पेपरवर्क में हेरफेर कर के भी माल को गंतव्य तक पहुँचाया जाता है। ऐसा दाखिल- खारिज, फर्जी रूट दिखाना, प्रमाणीकरण में जालसाजी और ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड को बदलकर किया जाता है ताकि इंश्योरर या बैंक को मालूम न हो कि तस्करी हो रही है।
पहचान छुपाने के अन्य तरीकों में GNSS या GPS लोकेशन को स्पूफ करना, फर्जी IMO नंबर या MMSI नंबर बनाना और ‘जॉम्बी’ जहाजों की पहचान अपनाना यानी पुराने-रिटायर्ड जहाजों की एन्ट्री फिर शुरू करना शामिल होता है।
शैडो फ्लीट में अधिकतर जहाज 20-30 साल पुराने होते हैं, जो आमतौर पर पश्चिमी बेड़े से रिटायर हो चुके होते हैं। इनकी तकनीकी हालत खराब होती है, रखरखाव कम होता है, और पर्यावरणीय खतरे जैसे तेल रिसाव या दुर्घटनाएं बहुत बढ़ जाती हैं।
ऐसा ज्यादातर इसलिए होता है कि इन जहाजों का कोई भरोसेमंद इंश्योरेंस नहीं होता। पारंपरिक इंश्योरेंस कंपनियां इन्हें कवर ही नहीं करती हैं। अगर हादसा या दुर्घटना हो जाती है तो इंटरनेशनल अथॉरिटीज के लिए नुकसान की भरपाई बहुत मुश्किल हो जाती है।
इनमें कमजोर टेक्नीकल निगरानी, खराब मेंटेनेंस, और अफसरों की सुरक्षा जोखिम बहुत अधिक होती है। इसमें आर्थिक और सुरक्षा खतरे भी हैं। यह पूरी प्रक्रिया न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की अवहेलना है बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कानूनी व व्यापारिक व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा पैदा करती है।
इसके अलावा ब्याज, इंश्योरेंस और डॉक्युमेंटेशन फर्जी होने की वजह से बैंकों, ट्रेडर्स और देशों को अप्रत्याशित कानूनी और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
भारतीय कंपनी पर प्रतिबंध क्यों लगा?
अमेरिका ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को भारत के दो कारोबारियों और उनकी कंपनियों जैर हुसैन और जुल्फिकार हुसैन के साथ उनकी कंपनी ‘RN Ship Management Private Limited’ को भी प्रतिबंधित किया है। यह कंपनी ईरान की सेपेहर एनर्जी जहान के लिए कई जहाजों का ऑपरेशन करती थी, जिनमें से एक जहाज ‘SOBAR’ भी था।
#BREAKING: U.S. Department of the Treasury has sanctioned two Indian nationals and their India-based ship-management firm as part of a crackdown on Iran’s oil network supporting its military. The targets include Indian nationals Zair Husain Iqbal Husain Sayed and Zulfikar… pic.twitter.com/t14kGia2rv— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) November 21, 2025
अमेरिका का आरोप है कि यह कंपनी ईरान के तेल नेटवर्क को सपोर्ट कर रही थी, जिससे ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड मिल रहा था। इसलिए अमेरिका ने इस कंपनी और उसके नेताओं पर प्रतिबंध लगा दिए हैं।
इसके अलावा, यूएई, पनामा, ग्रीस, जर्मनी और बल्गेरिया की कई कंपनियों और व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। इनमें Luan Bird Shipping Service L.L.C, Mars Investment L.L.C, Loire Shipping Inc., Altomare S.A., Moon Line Plastics and Raw Materials Trading L.L.C, Alsafeenah Althahabya Ship and Boats Spare Parts and Components Trading L.L.C, BPT Berlin Petroleum Trading GmbH, Shandong Independent Energy Trading DMCC शामिल हैं।
अमेरिका के प्रतिबंधों में कई व्यक्तियों के नाभी शामिल हैं। इनमें Hamidreza Heidari, Mohammad Moloudi, Kaveh Rostami Zahabi, Ahmad Ghaedi, Sayyed Mojtaba Hosseini, और Penka Ivanova Madzharska का नाम लिखा है। ये सभी ईरान के तेल नेटवर्क के लिए फ्रंट कंपनियों, जहाजों और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के जरिए आय जुटाने में मदद कर रहे थे।
अब तक किन-किन संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए?
अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें कुछ कंपनियाँ इस तरह हैं:
ईरान की सेना के तेल बिक्री विंग ‘सेपेहर एनर्जी जहान’ और उसकी फ्रंट कंपनियाँ।
ईरान की एयरलाइन ‘महान एयर’ और उसकी सब्सिडियरी ‘याजद इंटरनेशनल एयरवेज कंपनी’। यह एयरलाइन ईरान के आतंकवादी समूहों को सपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल की जाती थी।
ईरान के तेल नेटवर्क से जुड़ी कई शिपिंग कंपनियाँ और जहाज।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी कई वैज्ञानिक और तकनीकी कंपनियाँ।
ट्रंप प्रशासन अब तक 170 से अधिक जहाजों को प्रतिबंधित कर चुका है। फरवरी और मई 2025 में भी कई कंपनियों और जहाजों को ब्लैकलिस्ट किया गया था। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके।
ईरान के परमाणु प्रोजेक्ट से अमेरिका और पश्चिमी देशों को चिंता क्यों है?
ईरान अपने परमाणु प्रोजेक्ट को हमेशा से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बताता आया है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ ऊर्जा उत्पादन और मेडिकल रिसर्च के लिए है। ईरान ने कई बार दावा किया है कि वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा है और उसका लक्ष्य सिर्फ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है।
हालाँकि, अमेरिका और पश्चिमी देशों को ईरान के परमाणु प्रोजेक्ट पर भरोसा नहीं है। उनका दावा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के जरिए परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका और यूरोपीय देशों को चिंता है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार मिल गए तो वह पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकता है। ईरान पहले से ही लेबनान के हिज्बुल्लाह, यमन के हूती विद्रोहियों और सीरिया में असद सरकार को समर्थन देता है। परमाणु हथियार मिलने पर इन समूहों की ताकत और बढ़ सकती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को बड़ी समस्या का सामना करना होगा।
अमेरिका का मानना है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार मिल गए तो वह न केवल अपने पड़ोसी देशों के लिए खतरा बन जाएगा, बल्कि पूरे विश्व के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है।
इसके अलावा, अमेरिका को यह भी चिंता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से मिलने वाली तकनीक और ज्ञान का इस्तेमाल आतंकवादी समूहों को सपोर्ट करने के लिए कर सकता है। इसलिए अमेरिका और पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगा रहे हैं।
इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके। इसके अलावा, अमेरिका ईरान के तेल नेटवर्क को भी तोड़ने की कोशिश कर रहा है, ताकि ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड न मिल सके।
ट्रंप प्रशासन की रणनीति में ईरान को रोकने के लिए क्या है?
ट्रंप प्रशासन ने ईरान को रोकने के लिए ‘मैक्सिमम प्रेशर’ यानी दवाब नीति अपनाई है। इस नीति के तहत अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके।
अमेरिका ने अपने सहयोगियों से भी ईरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की अपील की है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अगर दुनिया भर के देश ईरान के खिलाफ एकजुट हो जाएँ तो ईरान को रोका जा सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने ईरान के तेल नेटवर्क को भी तोड़ने की कोशिश की है, ताकि ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड न मिल सके। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश की है।
इस विवाद का असर केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत जैसी कंपनियाँ भी प्रभावित होती हैं जिन्हें ईरान से जुड़ी गतिविधियों के कारण प्रतिबंध झेलना पड़ता है। तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ती है क्योंकि ईरान दुनिया के बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। इसके अलावा प्रतिबंध से मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है जिससे वैश्विक शांति और सुरक्षा को खतरा होता है।
निष्कर्ष
ईरान के साथ तेल डील करने वाली कंपनियों पर अमेरिका के प्रतिबंध इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका ईरान के परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को रोकने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से पूरे विश्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए वह ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए लगातार प्रतिबंध लगा रहा है। ट्रंप प्रशासन का भले ही मानना हो कि दुनिया भर के देश ईरान के खिलाफ एकजुट होकर उसे रोक सकते हैं, लेकिन अभी तक यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।







