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दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन या वामपंथी और कट्टरपंथियों का सम्मेलन: जानिए क्या है CASR, जिससे जुड़ा है हर्ष मंदर से लेकर उमर खालिद और शरजील इमाम का नाम

दिल्ली में इंडिया गेट के पास C-हेक्सागन में 23 नवंबर 2025 को तथाकथित ‘एंटी-पॉल्यूशन’ प्रोटेस्ट की सच्चाई तब सामने आ गई जब नक्सलवाद का महिमामंडन करते हुए नक्सली माडवी हिड़मा के समर्थन में नारे लगे। इसका आयोजन लेफ्ट-विंग स्टूडेंट संगठन भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और द हिमखंड ने किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिसवालों पर पेपर स्प्रे से हमला भी किया।

हिंसा को देखते हुए 22 लोगों पर केस दर्ज किया गया। पुलिस ने उनमें से 16 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें से 15 को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है जबकि एक नाबालिग को जुवेनाइल सेफ हाउस भेज दिया गया है। जैसे-जैसे इन लोगों और ग्रुप्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हुई, उनका कच्चा चिट्ठा सामने आ गया।

अधिकारियों ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 197 भी लागू की है। ये धारा तब लागू की जाती है, जब देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचने का खतरा हो।

bsCEM उन 40+ संगठनों में से एक है, जिन्होंने ‘कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन’ या CASR नाम का एक ग्रुप बनाया है। इंस्टाग्राम पर ये लोग ‘किस किस को कैद करोगे’ नाम का एक पेज चलाते हैं। संगठन तथाकथित ‘राजनीतिक कैदियों’ की रिहाई के लिए कैंपेन करते हैं।

यह ग्रुप 2018 से एक्टिव हुआ है। सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी 2022 से देखी जा सकती है, जब उन्होंने अब गुजर चुके नक्सली प्रोफेसर गोकरकोंडा नागा साईबाबा (GN साईबाबा) की रिहाई के लिए एक कैंपेन शुरू किया था। वे नक्सल ऑर्गनाइज़ेशन से जुड़े होने की वजह से जेल में थे। GN साईबाबा की जेल में मौत हो गई थी।

(स्रोत-इंस्टाग्राम)

इससे पहले, इसका हिंदी शीर्षक ‘किस किस को कैद करोगे’ वाला एक गाना था, जो 2018 में रिलीज हुआ था।

CASR के बैनर तले जो संगठन एक्टिव हैं, इनका इतिहास विवादास्पद रहा है। इनमें से कई संगठनों ने मार्च 2023 में ‘लेट कश्मीर स्पीक’ प्रोपेगैंडा इवेंट का समर्थन किया था। हंगामे के बाद दिल्ली पुलिस ने इवेंट की परमिशन रद्द कर दी, जिसके बाद इवेंट कैंसिल कर दिया गया।

ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIRSO)

ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIRSO) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्टूडेंट विंग है, जो 2009 में बनी थी। AIRSO खुद को एक स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के तौर पर दिखाता है, लेकिन इसका अपना लिटरेचर इसकी आइडियोलॉजी को साफ करता है। यह संगठन 1960 और 70 के दशक के हिंसक विद्रोहों का समर्थन करता है। यह नक्सलवाद को एक ‘महान संघर्ष’ के तौर पर देखता है और उस दौर के खून-खराबे को भारत के युवाओं को ‘जागृति’ करने के लिए जरूरी बताता है।

(स्रोत- फेसबुक)

इसका मकसद देशभर में एक ‘ताकतवर और व्यापक’ स्टूडेंट्स फ्रंट बनाना है, जो नक्सली हिंसा को हवा दे सके। AIRSO कोई स्टूडेंट्स बॉडी नहीं है, यह एक सोच को बढ़ावा देने वाला प्लेटफॉर्म है, जो स्टूडेंट एक्टिविज्म की आड़ में नक्सलवाद को बढ़ावा देता है।

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA)

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) एक रेडिकल स्टूडेंट्स मूवमेंट है। यह 1990 में बना था और यह ‘क्रांतिकारी बदलाव’ और ‘एक नई दुनिया’ के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करता है। हालाँकि यूनिवर्सिटी कैंपस में, खासकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में इसकी सोच जगजाहिर है। जहाँ हर साल गर्व से लाल झंडा लहराया जाता है। यह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की स्टूडेंट विंग है। उन्होंने भारत के मोस्ट वांटेड नक्सली माडवी हिड़मा की हत्या की निंदा की थी।

AISA का लिटरेचर नियो-लिबरल हमलों, इंपीरियलिस्ट हमलों से भरा हुआ है। यह टकराव वाली ‘स्ट्रीट पॉलिटिक्स’ का जश्न मनाता है और अपने एक्टिविज्म को फीस बढ़ाने से लेकर अमेरिकन इंपीरियलिज़्म तक हर चीज के खिलाफ लड़ाई के तौर पर दिखाता है।

यह स्टूडेंट्स का संगठन कम और कैंपस में चलने वाली रेडिकल मशीनरी ज्यादा है, जो लगातार शिकायतों और विरोध पर चलती है। स्टूडेंट अधिकारों की आड़ में शिक्षण संस्थान में अस्थिरता का माहौल पैदा करती है।

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF)

1936 में बनी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी सीपीआई की स्टूडेंट विंग है। यह अक्सर खुद को भारत की आजादी के लिए काम करने वाला पहला स्टूडेंट फेडरेशन बताती है। इसे कैंपस में CPI के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए जिंदा रखा गया है।

(स्रोत फेसबुक)

AISF की खुद की तारीफ करने वाली कहानी में जवाहरलाल नेहरू, APJ अब्दुल कलाम और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नामों का ज्यादा जिक्र किया जाता है। यह संगठन अभी भी आज़ादी से पहले वाले दौर से निकल नहीं पाया है। दरअसल AISF बहुत पहले ही स्टूडेंट-सेंट्रिक मुद्दों से भटक गया है और अब CPI की पुरानी पॉलिटिक्स का एक थका हुआ, सिद्धांतवादी हिस्सा बनकर काम करता है। संगठन आज के स्टूडेंट्स की असली चिंताओं को दूर करने के बजाय पुरानी यादों से ही चिपका रहता है।

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR)

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) खुद को एक नॉन-प्रॉफिटेबल संगठन के तौर पर दिखाता है जो ‘कानून और न्याय के बीच की खाई को पाटने’ का दावा करता है। लेकिन इसका ट्रैक रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयाँ करता है। 2006 में बना और सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड यह संगठन वर्कशॉप और सेमिनार के जरिए मुफ्त कानूनी मदद, फाइनेंशियल मदद और कानूनी साक्षरता प्रोग्राम चलाने का दावा करता है।

लेकिन APCR का नाम बार-बार विवादित मामलों में सामने आया है। संभल हिंसा और हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों जैसी हिंसक घटनाओं में आरोपी लोगों को कानूनी मदद दी है। इसकी तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट’ न्यूट्रल डॉक्यूमेंटेशन से ज़्यादा एकतरफा प्रोपेगैंडा लगती हैं, जो कुछ ग्रुप्स को बचाने और दूसरों को बदनाम करने के लिए बनाई गई हैं।

APCR में सीनियर वकील और एक्टिविस्ट शामिल हैं, फिर भी यह संगठन सिविल राइट्स बॉडी के तौर पर कम और एक ‘एडवोकेसी फ्रंट’ के तौर पर ज्यादा काम करता है। सांप्रदायिक मामलों के आरोपितों को बचाने के लिए सामने आता रहा है।

APCR के हर्ष मंदर और सबा नकवी जैसे लोगों के साथ भी मज़बूत रिश्ते हैं। हर्ष मंदर अपनी भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। इस साल मई में, उन्होंने ‘ऑपरेशन कगार’ के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की तरफ से सरकार से बातचीत करने की कोशिश की। CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उन्हें सिटीजन (अमेंडमेंट) एक्ट के बारे में झूठ और फर्जी जानकारी का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार के खिलाफ मुस्लिमों को भड़काते देखा गया था। 2023 में, मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स ने उनके NGO के खिलाफ जाँच की सिफारिश की थी और 2024 में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने FCRA उल्लंघन मामले में उनसे जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की थी।

सबा नकवी अपनी विवादित टिप्पणियों और लगातार हिंदू विरोधी रवैये के लिए जानी जाती हैं। जून 2022 में, उन्होंने ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग का अपमान किया था। इस साल मई में, जब भारत ने पहलगाम में हुए जानलेवा आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान पर जवाबी हमला किया, तो नकवी भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की अपील करते नजर आए।

इमरान भी APCR से जुड़े हैं। मसूद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘बोटी बोटी काटने’ की धमकी दी थी। उनकी जहरीली टिप्पणियों ने उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों का तारा बना दिया।

भीम आर्मी

सतीश कुमार, विनय रतन सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा 2015 में शुरू की गई भीम आर्मी खुद को दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले एक अंबेडकरवादी संगठन के रूप में पेश करती है। दरअसल यह एक बहुत ज्यादा टकराव वाला संगठन बन गया है, जो सड़कों पर भीड़ जुटाने, आक्रामक तेवर दिखाने और पहचान की राजनीति को बांटने पर फलता-फूलता है।

हालाँकि यह उत्तर प्रदेश में सैकड़ों मुफ्त स्कूल चलाने का दावा करता है, लेकिन ये संगठन लोगों को उकसाना, रैलियाँ करना और दलित-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन बनाने की कोशिशों में लगा रहता है।

इसका मिशन ‘टकराव वाली सीधी कार्रवाई’ है। चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व वाला यह संगठन अक्सर खुद को ‘बहुजन पहचान’ से जोड़ता है। संगठन खुल कर BJP को अपना मुख्य राजनीतिक दुश्मन कहता है। पिछले कुछ सालों में भीम आर्मी का नाम कई हिंसक घटनाओं में सामने आया। 2017 के सहारनपुर झड़पों से लेकर CAA के खिलाफ प्रदर्शनों में इसकी आक्रामक भूमिका रही।

बार-बार संवैधानिक वफादारी का दावा करने के बावजूद, इस ग्रुप ने लगातार कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट के बजाय उग्र आंदोलनों का सहारा लिया। असल में यह राजनीतिक फायदे के लिए जातिगत दरारों का फायदा उठाने की कोशिश करता है।

सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर रोहिणी घावरी नाम की एक महिला ने कई लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद करने का आरोप लगाया है। इस साल जून में, आजाद के संगठन के लोगों ने प्रयागराज में हंगामा किया। ये लोग निजी क्षेत्रों में आरक्षण की माँग कर रहे हैं।

फरवरी 2024 में, उन पर प्रशासनिक अधिकारियों को धमकी देने का आरोप लगा। उल्टे उन्होंने अधिकारियों पर SC/ST एक्ट के तहत केस किया, जबकि यह एक्ट हाशिए पर पड़े समुदायों को ज़ुल्म से बचाने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, ना कि राजनीतिक फायदे के लिए। हाल ही में लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक महिला को फर्जी SC/ST केस करने पर 3.5 साल जेल की सजा सुनाई थी।

भीम आर्मी स्टूडेंट फ़ेडरेशन (BASF) BASF भीम आर्मी की स्टूडेंट विंग है।

भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM)

भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) खुद को स्टूडेंट्स ‘डेमोक्रेटिक’ ग्रुप के तौर पर दिखाता है, लेकिन इसका आइडियोलॉजिकल झुकाव कुछ और बयाँ कर रहा है। 2018 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में bsCEM बना। ये खुद को भगत सिंह और चारु मजूमदार के क्रांतिकारी सिद्धांतों को मानने वाला बताता है। संगठन का मानना है कि स्टूडेंट्स को ‘वर्ग संघर्ष’ का हिस्सा बनना चाहिए और ‘पुराने को तोड़कर एक नया समाज बनाना चाहिए।’

यह स्टूडेंट एक्टिविज़्म नहीं है, यह DU कैंपस के लिए रीपैकेज किया गया पुराने जमाने का मार्क्सवादी आंदोलन है।

इसके बैनर और पर्चों में बार-बार माओ का जिक्र आता है। एजुकेशन सिस्टम को ‘सड़ा हुआ’ कह कर स्टूडेंट्स को ‘दबे-कुचले लोगों’ के साथ जुड़ने का आह्वान करते हैं। ये ‘हिन्दू आइडियोलॉजी’ के सख्त खिलाफ हैं। यह संगठन CAA-NRC, किसान आंदोलन, कैंपस में उत्पीड़न के मामलों पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने का दावा करता है, और यहाँ तक ​​कि एक मैगज़ीन भी निकालता है जो खुद को ‘क्रांतिकारी नजरिया’ बताता है।

bsCEM एक स्टूडेंट सपोर्ट बॉडी की तरह कम और दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर काम करने वाली एक रेडिकल मोबिलाइज़ेशन यूनिट की तरह ज्यादा काम करता है। यह आंदोलन, विचारधारा को बढ़ावा देने और व्यवस्था के खिलाफ बयानबाजी पर फलता-फूलता है।

कलेक्टिव

कलेक्टिव खुद को एक स्टूडेंट-यूथ मूवमेंट बताता है जो ‘इंडिया के लिए एक सोशलिस्ट फ्यूचर बना रहा है’, लेकिन इसका प्रोग्राम स्टूडेंट-सेंट्रिक होने के बजाय एक अनफिल्टर्ड आइडियोलॉजिकल मैनिफेस्टो जैसा लगता है।

मार्च 2021 में अपने पहले दिल्ली स्टेट कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी सोच सामने आ गई। इसमें पूँजीवाद के खत्मे, सर्वहारा क्रांति की बात की गई। इसमें कहा गया कि स्टूडेंट्स और ‘मेहनतकश लोगों’ की लीडरशिप में एक क्रांतिकारी बगावत ही देश को बचा सकती है।

कलेक्टिव के मुताबिक, आज इंडिया ‘ दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों के दबदबे’ में है, जिन्हें नियो-लिबरल कैपिटलिज्म, ग्लोबल फाइनेंस, और कथित तौर पर एंटी-साइंटिफिक, एंटी-सेक्युलर ट्रेंड्स से ताकत मिली है। यह ऑर्गनाइजेशन RSS और BJP को मेन विलेन बताता है। शासन पर ‘असहमति की हर आवाज को क्रिमिनलाइज करने’ का आरोप लगाता है। NEP से लेकर इकोनॉमिक रिफॉर्म्स तक हर पॉलिसी को इंपीरियलिस्ट इंटरेस्ट्स से सपोर्टेड एक कॉर्पोरेट कॉन्सपिरेसी के तौर पर दिखाया जाता है।

यह ग्रुप स्टूडेंट्स को सीखने वालों के तौर पर नहीं, बल्कि दुनिया भर में चल रहे एंटी-कैपिटलिस्ट संघर्ष में सबसे आगे रहने वाले लोगों के तौर पर दिखाता है। यह नक्सलवाद का महिमामंडन करता है और भगत सिंह से लेकर लैटिन अमेरिकी आंदोलनकारियों तक के क्रांतिकारियों को याद करता है। इसकी नजर में, आधुनिक शिक्षा ‘पूंजीवादी सोच का तंत्र’ है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। स्टूडेंट्स को ‘वर्ग संघर्ष’ की जानकारी दी जानी चाहिए।

हाल ही में कश्मीर टाइम्स के ऑफिस पर रेड पड़ने के बाद कलेक्टिव उसके सपोर्ट में आया था। पुलिस ने ऑफिस से गोला-बारूद बरामद किया था।

22 जनवरी 2024 को रामलला प्राण प्रतिष्ठा के वक्त राम मंदिर निर्माण को लेकर कलेक्टिव ने एक्स पर लिखा, ” भारत में बीजेपी-आरएसएस ने पर्यटन बढ़ाया”

COLLECTIVE कोई छात्र संगठन नहीं है। बल्कि ये मार्क्सवादी सोच के लोगों का प्लेटफॉर्म है। क्रांतिकारी बदलाव के लिए जोर दे रहा है। इसका लिटरेचर सरकार के खिलाफ बयानबाजी और विचारधारा की चिंता से भरा है। स्टूडेंट एंगेजमेंट के नाम पर, यह कैपिटलिज़्म, पेट्रियार्की, जाति के ढाँचे, चुनावी पॉलिटिक्स और यहाँ तक कि इंडियन स्टेट के मौजूदा आइडिया को भी खत्म करने की माँग करता है। फिलहाल यह कैंपस में काम करने वाले सबसे चरमपंथी ग्रुप्स में से एक बन गया है।

कमेटी फॉर रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स (CRPP)

कमेटी फॉर द रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स (CRPP) का गठन 2003 में हुआ था। रोना विल्सन, अमित भट्टाचार्य और SAR गिलानी ने इसे बनाया था। मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स ने प्रतिबंधित CPI (माओवादी) का एक फ्रंट बताया है।

‘सिविल लिबर्टीज़’ के बैनर तले काम करते हुए, यह उन लोगों की बिना शर्त रिहाई के लिए कैंपेन चलाता है जिन्हें यह ‘राजनीतिक कैदी’ कहता है।

इसके संस्थापकों में विवादास्पद रोना विल्सन भी शामिल हैं। पुणे पुलिस को पहले उनके दिल्ली घर से एक सनसनीखेज लेटर मिला था, जिसमें कहा गया था कि माओवादी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट करने के लिए ‘राजीव गाँधी-टाइप’ योजना बनाने की सोच रहे हैं।

इसके लिए M4 राइफल और दूसरी चीजें खरीदने के लिए 8 करोड़ रुपये माँगे गए थे। विल्सन को भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद केस में गिरफ्तार किया गया था। जाँच कर्ताओं ने आरोप लगाया कि वह शहरी नेटवर्क और जंगल में रहने वाले माओवादी कैडर के बीच कोऑर्डिनेट करता था और दोषी नक्सल विचारक जीएन साईबाबा का करीबी सहयोगी था।

छह साल से ज़्यादा जेल में रहने के बाद, विल्सन को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 8 जनवरी 2025 को ट्रायल में लंबी देरी के कारण बेल दे दी थी और 24 जनवरी को सख्त शर्तों पर रिहा कर दिया गया था, जिसमें अपना पासपोर्ट सरेंडर करना और NIA के सामने रेगुलर पेश होना शामिल था। हालाँकि उन्होंने किसी तरह के माओवादी लिंक से इनकार किया है, लेकिन विल्सन से SAR गिलानी जैसे लोगों के साथ उनके कनेक्शन को लेकर बार-बार पूछताछ की गई है।

दयार-ए-शौक स्टूडेंट्स चार्टर (DISSC)

दयार-ए-शौक स्टूडेंट्स चार्टर (DISSC) खुद को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक’ मास ऑर्गनाइज़ेशन बताता है, लेकिन असल में यह कैंपस में लेफ्ट-विंग पॉलिटिकल ग्रुप के तौर पर काम करता है।

2015 में बना यह ग्रुप बहस और असहमति को आवाज देने दावा करता है। इसका एक्टिविज़्म लगातार जामिया में बड़े लेफ्ट-इस्लामिस्ट इकोसिस्टम के साथ जुड़ा रहा है। यह स्टूडेंट मुद्दों को एकेडमिक चिंताओं के बजाय आइडियोलॉजिकल लड़ाइयों को आगे बढ़ाने के लिए एक गेटवे के तौर पर इस्तेमाल करता है।

कैंपस में होने वाले टकराव के दौरान ग्रुप का बर्ताव खुद ही सब कुछ बताता है। जून 2022 में, DISSC ने ABVP द्वारा ऑर्गनाइज़ किए गए एक एनवायरनमेंटल अवेयरनेस इवेंट को फिजिकली ब्लॉक करने के लिए कैंपस फ्रंट ऑफ़ इंडिया (अब बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया की स्टूडेंट विंग) जैसे इस्लामिस्ट ग्रुप्स के साथ हाथ मिलाया।

प्रोटेस्ट करने वालों ने जामिया के गेट बंद कर दिए, ‘नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हू-अकबर’, ‘ABVP मुर्दाबाद’ और ‘ABVP कैंपस छोड़ो’ के नारे लगाए। पर्यावरणविद इम्तियाज अली और DUSU प्रेसिडेंट अक्षित दहिया को कैंपस में घुसने से रोका। ABVP को ‘इस्लामोफोबिक’ और ‘नफरत फैलाने वाला’ कहा गया।

दरअसल DISSC एक स्टूडेंट बॉडी कम और लेफ्ट-इस्लामिस्ट कोएलिशन का फ्रंटलाइन पार्टिसिपेंट ज़्यादा है जो नियमित जामिया के कैंपस में पुलिसिंग का काम करता है, विरोधी विचारों को दबाता है और गैर-पॉलिटिकल घटनाओं को भी अग्रेसिव तरीके से आइडियोलॉजिकल बैटलग्राउंड के तौर पर दिखाता है।

डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन (DSU)

डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (DSU) जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक्टिव चरमपंथी स्टूडेंट ऑर्गनाइज़ेशन है। यह ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स फेडरेशन (AIRSF) का हिस्सा है और साफ़ तौर पर तथाकथित ‘न्यू डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशन’ के लक्ष्यों के लिए काम करता है, जो किसी स्टूडेंट-सेंट्रिक मकसद के बजाय कट्टर लेफ्ट एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलॉजी पर आधारित है।

DSU को 2016 में JNU की बदनामी के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है। 9 फरवरी 2016 को DSU के सदस्यों और सहयोगियों ने संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु और कश्मीरी अलगाववादी मकबूल भट की फाँसी दिए जाने का विरोध करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। कैंपस में ‘अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ जैसे नारे लगाए गए थे। DSU के पूर्व लीडर उमर खालिद को कन्हैया कुमार और अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ गिरफ्तार किया गया था।

उमर खालिद का रास्ता DSU के आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम को और दिखाता है। बाद में उसे UAPA के तहत 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया। जाँचकर्ताओं ने हिंसा की साजिश में उसके शामिल होने का आरोप लगाया। खालिद के बैकग्राउंड पर भी सवाल उठे हैं, क्योंकि उसके पिता, सैयद कासिम रसूल इलियास, अब बैन हो चुके आतंकवादी संगठन SIMI के सदस्य थे।

DSU एक स्टूडेंट संगठन के तौर पर कम और एक कट्टर-लेफ्ट पॉलिटिकल ग्रुप के तौर पर ज़्यादा काम करता है, जिसने एक्टिविज़्म की आड़ में बार-बार कैंपस में कट्टरपंथी बातों को आगे बढ़ाया है।

डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF)

डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF) दिल्ली यूनिवर्सिटी में लेफ्ट-विंग टीचर्स का एक संगठन है जो खुद को ‘डेमोक्रेटिक’ एकेडमिक स्पेस का डिफेंडर मानता है। यह लंबे समय से कैंपस में होने वाले आंदोलनों में शामिल रहा है, जिसमें मोदी सरकार की शिक्षा पहल, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी और पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनेट को खत्म करने के कदम जैसे केंद्रीय सुधारों का विरोध किया गया है।

फ्रेटरनिटी मूवमेंट

फ्रेटरनिटी मूवमेंट, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया की स्टूडेंट विंग है और ‘डेमोक्रेसी, सोशल जस्टिस और फ्रेटरनिटी’ के नारे के साथ काम करती है। नरम सोच के बावजूद, ग्रुप ने बार-बार खुद को कट्टरपंथी सोच के साथ जोड़ा है। फैटरमिटी दिल्ली में तथाकथित एंटी-पॉल्यूशन प्रोटेस्ट में मौजूद संगठनों में से एक था।

दिसंबर 2019 में एंटी-CAA प्रदर्शन के दौरान, इसके मेंबर्स ने कालीकट इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी ब्लॉक कर दिया था। वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया को खुद सैयद कासिम रसूल इलियास जैसे लोग लीड करते हैं, जो SIMI के पूर्व मेंबर और उमर खालिद के पिता हैं, और लंबे समय से इस्लामिस्ट झुकाव वाले एक्टिविज़्म से जुड़े रहे हैं।

कई विवादित एक्टिविस्ट फ्रेटरनिटी मूवमेंट से जुड़े हैं, जिनमें आफरीन फातिमा और आयशा रैना शामिल हैं। फातिमा ने पार्लियामेंट अटैक के दोषी अफजल गुरु का पब्लिकली बचाव किया है, और बार-बार फैसले पर ‘दोबारा सोचने’ की अपील की। उन्होंने राम मंदिर के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल उठाए। मीडिया में मशहूर रैना ने शरजील इमाम का खुलकर सपोर्ट किया, उसके खिलाफ पुलिस एक्शन को ‘विच हंट’ कहा और भड़काऊ अलगाववादी भाषणों के बावजूद उसके खिलाफ केस हटाने की माँग की।

इसलिए, फ्रेटरनिटी मूवमेंट स्टूडेंट राइट्स प्लेटफॉर्म के तौर पर नहीं, बल्कि वेलफेयर पार्टी के आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम के पॉलिटिकल एक्सटेंशन के तौर पर काम करता है, जो अक्सर कैंपस एक्टिविज्म की आड़ में एक्सट्रीमिस्ट, पोलराइजिंग और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नैरेटिव को सपोर्ट करता है।

इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स (IAPL)

इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स (IAPL) खुद को न्याय, बराबरी और ह्यूमन राइट्स के लिए कमिटेड ‘आम लोगों के वकील’ के तौर पर दिखाता है। इसका कॉन्स्टिट्यूशन इंडियन स्टेट को इंपीरियलिस्ट और दमनकारी दिखाना है। एंटी-इंपीरियलिस्ट संघर्षों को सपोर्ट करने का वादा करता है। कागज़ पर यह वकीलों और लीगल एक्टिविस्ट्स की एक नेशनल बॉडी है। हालाँकि, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की फाइंडिंग्स बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती हैं।

एल्गार परिषद केस में NIA चार्जशीट के मुताबिक, IAPL बैन CPI (माओवादी) का एक फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन है। इन्वेस्टिगेटर्स ने गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए, जिसमें बताया गया कि ग्रुप की एक्टिविटीज़, फैक्ट-फाइंडिंग मिशन, लीगल सपोर्ट नेटवर्क और मीटिंग्स में अक्सर ऐसे लोग शामिल होते थे, जिन पर माओवादी होने का शक है।

एक गवाह ने 2018 में कश्मीर में फैक्ट-फाइंडिंग विज़िट के बारे में बताया कि यहाँ माओवादी सोच वाले वकील के अलावा भी लोग थे। जब यह बात आरोपित अरुण फरेरा को बताई गई, तो कथित तौर पर वह ‘बस मुस्कुराया’।

NIA ने इस बात पर जोर दिया कि IAPL का काम कानूनी एक्टिविज़्म की आड़ में लगातार माओवादी एजेंडा को आगे बढ़ाना था। माओवादी मामलों से जुड़े कई एक्टिविस्ट इसके जरिए काम करते थे। हालाँकि कुछ सदस्यों ने विचारधारा के मतभेदों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया, लेकिन एजेंसी का कहना है कि इस संगठन ने माओवादी नेटवर्क को सपोर्ट देने वाले एक कवर स्ट्रक्चर के तौर पर काम किया है।

मानवाधिकारों की सुरक्षा के अपने दावों के बावजूद, यह संगठन CPI (माओवादी) के बड़े शहरी सपोर्ट सिस्टम के हिस्से के तौर पर बार-बार जाँच में सामने आया है। ऑपरेटिव को बचाने, बातों पर असर डालने और चरमपंथी मकसदों को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी राय, वकालत और फैक्ट-फाइंडिंग मिशन का इस्तेमाल करता है। हालाँकि, संगठन ने दावा किया है कि उसका CPI (माओवादी) से कोई लेना-देना नहीं है।

नज़रिया मैगज़ीन

नज़रिया मैगज़ीन खुले तौर पर मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी पब्लिकेशन है जो भारत को ‘ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फासीवाद’ देश के तौर पर दिखाता है और खुद को ‘क्रांतिकारी पॉलिटिक्स’ के लिए एक आइडियोलॉजिकल हथियार के तौर पर पेश करता है। यह जोर देता है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद ही ‘वर्ग संघर्ष’ को खत्म कर एक नई सोशलिस्ट व्यवस्था बनाने का एकमात्र रास्ता है।

2024 में, नज़रिया उस वक्त एक बड़े स्कैंडल में फँस गया, जब उसके समर्थक ने मुकुंदन नायर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसका सपोर्ट करने के बजाय, नज़रिया ने एक इंटरनल कमेटी बनाई जिसने आरोपी के खिलाफ ही सिफारिश की। जब सर्वाइवर ने एतराज़ किया, तो ऑर्गनाइज़ेशन ने उसे नवंबर 2024 में निकाल दिया और उस पर ‘इंपीरियलिस्ट आइडियोलॉजी’ और ‘कम्युनिस्ट मोरैलिटी’ का उल्लंघन करने के आरोप लगाते हुए बयान जारी कर दिया। ये हमले सर्वाइवर को बदनाम करने और आरोपी को बचाने के लिए किए गए।

बाद में सर्वाइवर ने बताया कि bsCEM से जुड़े एक्टिविस्ट ने उसे बदनाम करने और झूठे दावे फैलाने में हिस्सा लिया था। तस्वीरें सामने आईं जिनमें bsCEM के सदस्य मुकुंदन के साथ मिलते-जुलते दिखे, जबकि उन्होंने निजी तौर पर माना था कि उन्हें आरोपों के बारे में पता था।

इस मामले में नज़रिया, bsCEM, FACAM और यहाँ तक कि SfPD ने पूरे घटनाक्रम को आइडियोलॉजिकल लड़ाई में बदल दिया, कमेंट्स डिलीट कर दिए, आलोचना करने वालों को ब्लॉक कर दिया और सर्वाइवर के ट्रॉमा का इस्तेमाल पॉलिटिकल पॉइंट बनाने के लिए किया।

इस एपिसोड ने नज़रिया के दोगलेपन को सामने ला दिया, जिसमें एक ऐसे ग्रुप का खुलासा हुआ जो एक यौन उत्पीड़न के आरोपित को बचाता है, जबकि आइडियोलॉजिकल शुद्धता बनाए रखने के लिए अपने ही कर्मचारी को बदनाम करता है।

रिहाई मंच

यह एक पॉलिटिकल फ्रंट है जो दमन का विरोध करने का दावा करता है। यह एंटी-CAA और किसान विरोध प्रदर्शनों सहित कई विरोध प्रदर्शनों में शामिल था।

स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI)

स्टूडेंट्स फेडरेशन इन इंडिया एक लेफ्ट-विंग स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन है। ऑपइंडिया ने इस ऑर्गनाइजेशन को बड़े पैमाने पर कवर किया है। इसे यहाँ चेक किया जा सकता है।

यूनाइटेड पीस अलायंस

यूनाइटेड पीस अलायंस एक पॉलिटिकल फ्रंट है जिसे मीर शाहिद सलीम लीड कर रहे हैं, जिसे कश्मीर में ‘दमन के खिलाफ विरोध’ के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर बनाया गया है। हालाँकि यह शांति और अधिकारों की भाषा का इस्तेमाल करता है, लेकिन यह ग्रुप लगातार भारत सरकार के खिलाफ बयानबाजी करता है, खासकर आर्टिकल 370 के हटने के बाद।

संगठन के चेयरमैन सलीम अक्सर कहते हैं कि केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 से कश्मीरियों को ‘डराया’ और ‘दबाया’ है। उनके नेतृत्व में, यूनाइटेड पीस अलायंस ने कॉन्फ्रेंस की हैं। 5 अगस्त को जश्न मानने का विरोध किया और इसे ‘ब्लैक डे’ के तौर पर मनाने की वकालत की।

ग्रुप की गतिविधियां 370 विरोधी भावनाओं को बढ़ाने, संवैधानिक बदलावों को दमन के तौर पर दिखाने और इन दावों के इर्द-गिर्द पॉलिटिकल लामबंदी करने के इर्द-गिर्द घूमती हैं। शांति में योगदान देने के बजाय, यूनाइटेड पीस अलायंस एक और प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करता है, जो अधिकारों की वकालत की आड़ में अलगाववादी बयानबाजी को जिंदा रखता है।

यूथ 4 स्वराज (Y4S)

यूथ 4 स्वराज (Y4S) योगेंद्र यादव की पॉलिटिकल पार्टी, स्वराज इंडिया की स्टूडेंट-यूथ विंग है। हालाँकि यह खुद को ‘अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स’ और सूखा राहत से लेकर कैंपस एक्टिविज्म तक के मुद्दों पर युवाओं को इकट्ठा करने के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर दिखाता है, लेकिन इस ऑर्गनाइजेशन पर सेक्शुअल असॉल्ट और इंस्टीट्यूशनल उदासीनता के गंभीर आरोप लगे हैं।

2020 में, Y4S की एक पुरानी मेंबर ने यूथ 4 स्वराज के उस समय के प्रेसिडेंट मनीष कुमार पर सबके सामने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसने कहा कि उसने योगेंद्र यादव और दूसरे सीनियर नेताओं को इस गलत काम के बारे में बताया था, लेकिन उसकी शिकायतों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। उसके बयान के मुताबिक, स्वराज इंडिया के मेंबर्स ने उसे मेंटली ट्रॉमा दिया और आखिरकार उसे इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। असॉल्ट की रिपोर्ट करने के बाद भी, मनीष कुमार किसानों के प्रोटेस्ट के दौरान सिंघु बॉर्डर पर Y4S को रिप्रेजेंट करते रहे।

सर्वाइवर ने यह भी आरोप लगाया कि जब उसने सीधे योगेंद्र यादव से बात की, तो उन्होंने चुप्पी साध ली, जबकि स्वराज इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट अविक साहा ने उसे सिर्फ पुलिस के पास जाने के लिए कहा। इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि संगठन ने गलत काम करने वालों को बचाया, जबकि आवाज उठाने वाली महिलाओं को बदनाम किया गया।

दूसरे संगठनों में ASA, BSM, CEM, CSM, CTF, LAA, फोरम अगेंस्ट रिप्रेशन तेलंगाना, कर्नाटक जनशक्ति, मजदूर अधिकार संगठन, मजदूर पत्रिका, NAPM, निशांत नाट्य मंच, न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव (NTUI), पीपल्स वॉच, समाजवादी जनपरिषद, समाजवादी लोक मंच, बहुजन समाजवादी मंच, वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन (WSS), नौरोज, इनोसेंस नेटवर्क और दूसरे शामिल हैं।

कुल मिलाकर, इंडिया गेट पर हुए इवेंट्स और इन संगठनों की प्रोफाइल से यह साफ है कि ‘एंटी-पॉल्यूशन’ प्रोटेस्ट एयर क्वालिटी इंडेक्स के ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में जाने को लेकर नहीं था। बल्कि यह एक कोऑर्डिनेटेड आइडियोलॉजिकल एजेंडा को आगे बढ़ाने के बारे में था, जो नक्सलियों को महिमामंडित करता है, भारतीय संस्थानों को कमजोर करता है और देश के खिलाफ कैंपस, कोर्ट और ‘सिविल राइट्स’ की भाषा को हथियार बनाता है।

स्टूडेंट्स की संस्थाओं और ‘अधिकारों’ के ग्रुप्स से लेकर वकीलों के फ्रंट और कश्मीर प्रेशर ग्रुप्स तक, bsCEM और CASR के आस-पास का नेटवर्क कोई अचानक नहीं बना है। यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जो भारत विरोधी बयानबाजी को नॉर्मल मानता है। गंभीर आरोपों का सामना कर रहे लोगों को सजा से बचाता है। यह रिपोर्ट OpIndia सीरीज की बस शुरुआत है, जो सिलसिलेवार तरीके से नक्सल समर्थक, लेफ्ट-झुकाव वाले ग्रुप्स के ऑर्गनाइज़ेशनल जाल को सामने लाएगी। उनके भारत विरोधी गतिविधियों का पर्दाफाश करेगी।

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