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छात्र प्रदर्शन के नाम पर चल रहा राजनैतिक एजेंडा: जानिए पंजाब यूनिवर्सिटी में बड़े गुटों ने की कैसे घुसपैठ, ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में सब कुछ

16 नवंबर 2025 को जब ऑपइंडिया की टीम पंजाब विश्वविद्यालय पहुँची तो ग्राउंड पर चल रहा नजारा वैसा नहीं दिख रहा था जैसा कि सोशल मीडिया में चर्चा में है। कैंपस के अंदर कई छात्र शांतिपूर्वक धरना स्थल पर बैठे थे और बार-बार अपनी वही साधारण माँग दोहरा रहे थे- सीनेट चुनावों की तारीख घोषित की जाए।

जिन छात्रों से ऑपइंडिया ने बात की, वे चाहते थे कि चुनाव की तारीख घोषित हो जाएँ तो वे तुरंत कक्षाओं में लौटें और अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करें। उनके चेहरों पर पाठ्यक्रम छूट जाने की चिंता साफ दिखाई दे रही थी। पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र स्पष्टता चाहते थे, अव्यवस्था नहीं।

एक छात्र अवतार सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाएगा, हमारी हड़ताल समाप्त हो जाएगी। उसने बताया कि छात्रों को पता है कि सीनेट चुनाव कराने में 200 दिन से अधिक लगते हैं और वे किसी से रातों-रात चमत्कार की माँग नहीं कर रहे। वे चाहते थे कि प्रक्रिया शुरू हो, जो विश्वविद्यालय ने कुछ दिन पहले ही घोषित कर दी है।

हालाँकि जैसे ही छात्र-समूह के घेरे से बाहर निकल कर देखना शुरू किया तो पाया कि नजारा पूरी तरह बदल जाता है। वहाँ ट्रैक्टर, लंगर वाहन, लाउडस्पीकर (हालाँकि हमारे जाने के समय वे शांत थे), राजनीतिक बैनर, किसान यूनियन के झंडे और ऐसे समूह मौजूद थे जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।

खुद को यूनियन सदस्य, राजनेता और कार्यकर्ता कहने वाले ये लोग उस जगह पर कब्जा किए बैठे थे जो असल में विश्वविद्यालय के पूर्व या वर्तमान छात्रों की होनी चाहिए।

साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट

कुछ ऐसा ही किसान आंदोलन के दौरान भी हुआ था, जहाँ किसानों की वास्तविक समस्याएँ राजनीतिक अवसरवाद और पहचान-आधारित लामबंदी के शोर में दब गई थीं। पंजाब विश्वविद्यालय में सीनेट चुनावों की शांतिपूर्ण माँग अब राज्य बनाम केंद्र के टकराव में घसीट ली गई है। जाहिर है, इस नए बवंडर में सबसे ऊँची आवाजें छात्रों की नहीं बल्कि उन लोगों की थीं जो छात्रों के आंदोलन के पीछे अपने एजेंडे चला रहे थे।

10 नवंबर को विश्वविद्यालय के गेट तोड़े जाने के साथ ही ये साफ हो गया कि बाहरी लोग अपने एजेंडे के साथ आए थे। FIR में भी यह दर्ज है कि गेट नंबर 1 को जबरन खोलने वाली भीड़ में बड़ी संख्या गैर-छात्र शामिल थे। पुलिस अधिकारियों ने बयान में कहा कि हालाँकि कुछ पीयू छात्र आगे थे, लेकिन बैरिकेड तोड़ने और धक्का-मुक्की करने का काम उन लोगों ने किया जिनका विश्वविद्यालय से कोई लेना-देना नहीं था।

फिर भी इन झड़पों को सीनेट मुद्दे का स्वाभाविक परिणाम बताया जा रहा है। सच्चाई यह है कि ये टकराव अवसरवादी हस्तक्षेप का नतीजा हैं और खुद छात्र भी इसे जानते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए पंजाव विश्वविद्यालय की कुलपति रेनू विग तक ने ये कहा कि छात्रों ने कहा है कि ये अब सीनेट तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा, “छात्रों ने ये मुझसे सामने से तो नहीं कहा, लेकिन वार्डेन और कमेटी के जरिए उन्होंने ये बात पहुँचाई है कि वे लाचार महसूस कर रहे हैं।”

छात्र असल में क्या चाहते हैं और कैसे उनके अंदर डर बैठाया जा रहा है

अगर हम स्लोगन, पॉलिटिकल स्पीच, यूनियन का अंदाज और सोशल मीडिया पर चल रहे शोर को देखें तो पता चलेगा कि छात्रों की माँगे काफी स्पष्ट हैं। वे चाहते हैं कि सीनेट चुनावों के जरिए बहाल हो। वे चाहते हैं कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार एक वैध गवर्निंग बॉडी (शासी निकाय) बने। सलाथ ही वे चाहते हैं कि पिछले एक साल की अनिश्चितता खत्म हो। वे चंडीगढ़ के मालिकाना हक की माँग करने वालों में से नहीं हैं। वे विश्वविद्यालय पर पहचान-आधारित दावा नहीं कर रहे। वे संघवाद के नारे नहीं लगा रहे। वे केंद्र से यह नहीं कह रहे कि अपना सामान बाँधकर केंद्र शासित प्रदेश को छोड़ दे।

ऑपइंडिया की छात्रों से हुई बातचीत से साफ था कि वे सीनेट पर स्पष्टता चाहते हैं और जैसे ही चुनाव की तारीख घोषित हो, तुरंत कक्षाओं में लौटकर पढ़ाई शुरू कर सकें।

हालाँकि उनका विरोध केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ है जिसमें सीनेट सदस्यता को नामांकन-आधारित बनाने की एक अधिसूचना थी। इसे केंद्र सरकार पहले ही वापस ले चुकी है। ऐसे में वे केंद्र के खिलाफ नहीं हैं। वे बस अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहते हैं।

हमने देखा कि कैंपस के अंदर एक और अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें छात्रों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि जैसे ही केंद्र सीनेट पर ‘कब्जा’ करेगा, वैसे ही विश्वविद्यालय तानाशाह बन जाएगा, फीस बढ़ा दी जाएगी और पंजाब हमेशा के लिए इस संस्थान को खो देगा।

यही बातें हमें उन लोगों ने दोहराईं जो छात्र नहीं थे लेकिन स्थल पर मौजूद थे। यह डर बैठाया जा रहा है। यह स्वाभाविक नहीं है और यह छात्रों के बजाय राजनीतिक समूहों के हितों को कहीं अधिक साधता नजर आता है।

कानाफूसी इस बात की भी है कि केंद्र सरकार की ये अधिसूचना विश्वविद्यालय को राज्य से ‘छीनने’ की कोशिश थी। इस स्थिति को उसी दिन सुलझ जाना चाहिए था जब केंद्र ने अधिसूचना वापस ली, फिर भी ये किसी तरह अस्तित्व के संकट के रूप में बदल गई। असल में ये असमंजस अचानक नहीं है।

यह वही नजारा है जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई समूहों ने डर, पहचान और अविश्वास की समानांतर कहानियाँ चलाईं। किसान आंदोलन ने किसानों और यूनियन के बीच गहरी खाई बना दी थी। मूल मुद्दे दूसरे एजेंडों के शोर में दब गए थे।

यहाँ भी पंजाबियत, केंद्र बनाम राज्य राजनीति, क्षेत्रीय पहचान और धार्मिक पहचान की कहानियाँ छात्रों के विश्वविद्यालय के आंतरिक चुनावों की माँग पर हावी हो गई हैं।

सीनेट और सिंडिकेट क्या हैं?

सीनेट और सिंडिकेट पंजाब विश्वविद्यालय की दो वैधानिक गवर्निंग बॉडी (शासी संस्थाएँ) हैं। सीनेट सर्वोच्च प्राधिकरण है, जिसमें निर्वाचित स्नातक, प्रोफेसर, छात्र प्रतिनिधि और केंद्र-राज्य के नामित सदस्यों समेत सौ से अधिक सदस्य शामिल होते हैं।

सीनेट नीतियाँ बनाती है, बजट को मंजूरी देती है, नियुक्तियों की देखरेख करती है और प्रमुख शैक्षणिक और प्रशासनिक निर्णय लेती है। सिंडिकेट कार्यकारी निकाय के तौर पर काम करती है, जिसमें लगभग पंद्रह से बीस सदस्य होते हैं। जहाँ सीनेट निर्णय लेती है, वहीं सिंडिकेट उन निर्णयों को लागू करती है।

राजनीतिक यूनियन, किसान समूह और मजदूर संगठन प्रदर्शन पर कैसे हावी हो रहे हैं

अगर कोई अब भी ये मानता है कि यह केवल छात्रों द्वारा चलाया गया आंदोलन है तो उसने पिछले कुछ दिनों में पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा स्थल का दौरा नहीं किया। जब ऑपइंडिया कैंपस पहुँचा तो धरना स्थल पर ट्रैक्टर, लंगर स्टॉल, राजनीतिक पोस्टर और छात्रों से परे लोग हर तरफ मौजूद थे।

यह पैटर्न नया नहीं है। हमने इसे किसान आंदोलन के दौरान भी देखा था। कुछ खास समूह किसी वैध शिकायत को पहचानने में माहिर होते हैं, ‘समर्थन’ के नाम पर आंदोलन में प्रवेश करते हैं और फिर धीरे-धीरे आंदोलन की दिशा और आवाज बदल देते हैं। इसके बाद मूल मुद्दा अपनी पहचान खो देता है। यहाँ भी ठीक वही हुआ है।

सीनेट चुनाव की माँग से शुरू हुआ ये प्रदर्शन भी अब इस तरह से बदल रहा है-

पंजाब बनाम केंद्र मुद्दा

पंजाब बनाम हरियाणा

चंडीगढ़ का मालिकाना हक

पंजाबियत के नारे

टुकड़ों में आ रही राजनीतिक पार्टियाँ

10 नवंबर 2025 को बाहरी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के दौरान, एसएसपी कनवदीप कौर गेट पर चढ़ गईं और भीड़ को समझाने की कोशिश की। अंदर घुसने की कोशिश कर रहे बाहरी लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि पुलिस बिना बल प्रयोग किए उन्हें रोक नहीं सकती थी।

प्रदर्शनकारियों ने गेट तोड़ दिए और लोगों की भारी भीड़ कैंपस में घुस गई। उस दिन ट्रैक्टर, ट्रॉली, यूनियन प्रतिनिधि, राजनीतिक कार्यकर्ता और संगठनों के झंडे लेकर लोग कैंपस में दाखिल हुए जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।

असल में तो न पुलिस और बाहरी समूहों, संगठनों और व्यक्तियों को ऐसे आंदोलनों में दखल न देकर बाहर ही रहना चाहिए। लेकिन घटनाएँ वैसी नहीं हुईं जैसी होनी चाहिए थीं।

आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल वहाँ पहुँचे। किसान यूनियन के नेता बलबीर सिंह राजेवाल, हरिंदर लखोवाल और इंदरपाल बैंस अपने कार्यकर्ताओं के साथ आए। यहाँ तक कि जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह के पिता और उग्रवादी नेताओं के परिवारजन भी कैंपस पहुँच गए।

लखा सिधाना जैसे गैंगस्टर से कार्यकर्ता बने लोग, गायक सतिंदर सरताज और कई अन्य लोग कैंपस पहुँचे। असली छात्र नेता, जिन्हें पूरे आंदोलन की आवाज होना चाहिए था, उन्हें किनारे कर दिया गया ताकि ये नेता मंच पर बोल सकें।

प्रदर्शन में इन लोगों की घुसपैठ के साथ एक अलग ही शब्दावली आ गई। इसके तहत ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ और ‘राज करेगा खालसा’ जैसे नारे हवा में गूँजने लगे। इन नारों का सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है, न ही इनका पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम और लोकतांत्रिक निकायों की बहाली से कोई संबंध है। इनका पूरा संबंध राजनीतिक स्थिति बनाने, पहचान बताने और यह छवि गढ़ने से है कि विश्वविद्यालय सभी छात्रों और स्टेकहोल्डर्स के बजाय एक विशेष सांस्कृतिक समूह का है।

इस शोर के बीच छात्रों की असल माँगें लगभग खो गई। राजनीतिक खिलाड़ियों की इन प्रदर्शनों की अपेक्षाएँ छात्रों की अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग हैं और इन्हीं दो एजेंडों के बीच की खाई ही इस अव्यवस्था का कारण बन रही है।

निहंगों की मौजूदगी और खालिस्तानी विचारधारा का परिचय

उस दिन कैंपस में पहुँचे कई समूहों में निहंग भी शामिल थे। ऑपइंडिया ने आंदोलन के दौरान मौजूद एक निहंग से बातचीत की। सतही तौर पर उन्होंने बार-बार यह कहा कि वे केवल ‘बच्चों’ का समर्थन करने आए हैं।

उन्होंने अपनी मौजूदगी को अभिवावक और सुरक्षात्मक जैसा बताया। लेकिन बातचीत के दौरान उन्होंने एक ऐसी लाइन कही जिसने यह साफ कर दिया कि उनकी सोच अलग है और उसका सीनेट चुनावों से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने लगभग शब्दशः कहा, “जब हिंदू भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो कोई कुछ नहीं कहता। लेकिन जब दूसरे कुछ माँगते हैं तो समस्या बन जाती है।”

उन्होंने ‘खालिस्तान’ शब्द का साफ शब्दों में इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उन्हें करने की जरूरत भी नहीं थी। जो भी पंजाब को लंबे समय से कवर करता है, वह समझता है कि ‘दूसरे कुछ माँगते हैं’ का मतलब किस संदर्भ में किया जा रहा है। यह एक सांकेतिक भाषा है, जिसका इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो अलगाववादी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन सीधे कानूनी जाँच के घेरे में नहीं आना चाहते।

यहीं पर आंदोलन चुनावों और कैंपस लोकतंत्र से कहीं आगे एक खतरनाक क्षेत्र में चला जाता है। जब निहंग समूहों के प्रतिनिधि असंबंधित राष्ट्रीय तुलना करने लगते हैं और विश्वविद्यालय आंदोलन के अंदर पहचान-आधारित शिकायतों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं तो इसका मतलब है कि आंदोलन उनके वैचारिक संदेशों का व्यापक जरिया बन गया है।

सीनेट आंदोलन को लीड कर रहे छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल या यूनियन को आंदोलन में आने के लिए नहीं कहा। लेकिन जैसे ही गेट जबरन खोले गए और बाहरी समूह अंदर आए तो वह जगह छात्रों के नियंत्रण में नहीं रही।

आंदोलन तितर- बितर हो गया और एक बार ऐसा होने पर वे किस्से जो असल मुद्दे से कोई संबंध नहीं रखते, ‘समर्थन’ के नाम पर चुपचाप आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं। जिन छात्रों से हमने बात की, उन्होंने कहा कि ये समूह ‘मौजूद होने चाहिए’ क्योंकि वे उनका समर्थन करते हैं।

हालाँकि कुछ आवाजें ऐसी भी थीं जो उलझन में थीं और यहाँ तक कि छात्रों के आंदोलन के हड़प लिए जाने को नापसंद करती थीं। उदाहरण के तौर पर, हिंदुस्तान स्टूडेंट एसोसिएशन (HSA) के अधिकारियों ने अलगाववादी नारों और विश्वविद्यालय पर पंजाब के दावे का समर्थन करने से साफ इनकार कर दिया।

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मोर्चे के अंदर दरारें- पंजाब बनाम हरियाणा नैरेटिव हावी

जैसे-जैसे गेट के बाहर राजनीतिक तमाशा तेज होने लगा, पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा के अंदर पहली असली असहजता देखने को मिली। 12 नवंबर को, पीयू कैंपस स्टूडेंट्स’ काउंसिल के संयुक्त सचिव और पहले के हलफनामे अभियान का प्रमुख चेहरा रहे मोहित मंडेराना ने मोर्चा से इस्तीफा दे दिया। उसका इस्तीफा एक अहम संकेत है क्योंकि यह वह बात सामने रखता है जो कई छात्र व्यक्तिगत तौर पर कानाफूसी करते रहे हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से कहने से डरते हैं- आंदोलन अपने मकसद से भटक गया है।

हालाँकि वह ‘बीजेपी और आरएसएस विचारधारा’ के डर को फैलने से रोक नहीं पाए। अपने बयान में उसने कहा, “यह संघर्ष पंजाब विश्वविद्यालय को राजनीतिक हस्तक्षेप, खासकर बीजेपी और आरएसएस विचारधारा से बचाने के लिए था। लेकिन 10 नवंबर का आंदोलन क्षेत्रीय मालिकाना हक के बारे में हो गया, विश्वविद्यालय को बचाने के बारे में नहीं।” ये बयान बताता है कि किस तरह हर तरह से डर फैलाने की कोशिश की जा रही है।

एक वीडियो में उसे कहते हुए देखा गया कि यह ‘पंजाब और हरियाणा’ का निजी मामला है और वे इसे घर पर ही सुलझा लेंगे। उसने कहा, “हमें किसी दिल्ली एजेंट की जरूरत नहीं है।”

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दूसरी ओर, कुछ छात्रों ने ऑपइंडिया से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि वे ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ नारों की बाढ़, सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना न रखने वाले नेताओं के घुसने और अचानक ऑनलाइन फैल रही उस जानकारी से बेहद असहज थे जिसमें दावा किया जा रहा था कि हरियाणा विश्वविद्यालय को ‘कब्जा’ करना चाहता है।

ध्यान देने वाली बात ये है कि पंजाब बनाम हरियाणा का यह नैरेटिव नया नहीं है। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने। तब से इन राज्यों के बीच यह खींचतान हमेशा रही है, लेकिन यह विश्वविद्यालय कैंपस में पहले कभी इस तरह नहीं घुसी थी।

सीनेट चुनावों को इतिहास में भी कभी भी क्षेत्रीय लड़ाई में नहीं बदला गया। दोनों राज्यों के छात्र दशकों से एक साथ पढ़ते आए हैं। हरियाणा के अपने विश्वविद्यालय हैं और वह पीयू को फंड नहीं करता। हिमाचल के भी अपने संस्थान हैं। असल में यह मुद्दा क्षेत्रीय नहीं बल्कि प्रशासनिक था।

लेकिन जैसे ही राजनीतिक खिलाड़ी मैदान में उतरे, ‘पंजाब का आखिरी प्रतीक खतरे में’ का नैरेटिव आगे बढ़ाना आसान हो गया। सीनेट का मुद्दा जमीन, पहचान और इतिहास के नारों में बदल गया। स्वाभाविक रूप से, हरियाणा आधारित छात्र समूहों ने प्रतिक्रिया दी और आंदोलन कानून की बजाय भावनाओं का युद्धक्षेत्र बन गया।

इसलिए मंडेराना का इस्तीफा सिर्फ असहमति नहीं था। यह आंदोलन पर हावी होने को लेकर पैदा हुई पहली साफ दरार थी। अगर अंदरूनी लोग ही एकमत नहीं हैं, तो यह केवल समय की बात है कि छात्र अपनी जगह वापस हासिल कर पाएँ या आंदोलन अपने ही बोझ तले ढह जाए।

वर्तमान आंदोलन में एबीवीपी की स्थिति

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) पंजाब विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पविंद्र सिंह नेगी ने ऑपइंडिया को बताया कि एबीवीपी छात्रों के साथ खड़ी है और सीनेट चुनावों की तारीख घोषित करने की उनकी असल माँग का समर्थन करती है।

हालाँकि संगठन सक्रिय रूप से आंदोलन में भाग नहीं ले रहा क्योंकि इसे बाहरी लोगों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार पहले ही अधिसूचना वापस ले चुकी है और हाई कोर्ट ने भी छात्रों को कक्षाओं में लौटने को कहा है, ऐसे में आंदोलन जारी रखने का कोई ठोस कारण नहीं बचता।

उनके अनुसार अब बाहरी लोग आंदोलन को पूरी तरह अलग दिशा में ले जा रहे हैं ताकि अपने एजेंडे साध सकें। उन्होंने स्थगित परीक्षाओं पर भी चिंता जताई क्योंकि इससे परिणामों में देरी होगी और प्लेसमेंट में समस्याएँ आएँगी।

उन्होंने कहा, “आज भी छात्र हमसे मिले। वे स्थगित परीक्षाओं को लेकर चिंतित थे। अगर समय पर परिणाम नहीं आए तो वे प्लेसमेंट की तारीख़ों से कैसे मेल खाएँगे?”

छात्रों में डर कैसे पैदा किया जा रहा है और इससे किसे फायदा हो रहा है

राजनीति में डर एक शक्तिशाली हथियार है, खासकर तब जब इसे ऐसे युवा छात्रों के समुदाय में डाला जाए जो पहले से ही शैक्षणिक अनिश्चितता में जी रहा हो। पिछले सप्ताह छात्रों में कुछ अलग ही तरह के डर जानबूझकर फैलाए गए हैं जैसे कि-

केंद्र का नियंत्रण आने पर विश्वविद्यालय तानाशाही बन जाएगा

फीस अचानक बहुत बढ़ जाएगी

चुनाव कभी नहीं होंगे

पंजाब विश्वविद्यालय को पंजाब से ‘छीन लिया’ जाएगा

चंडीगढ़ स्थायी रूप से बदल दिया जाएगा

पंजाब की पहचान पर हमला हो रहा है

यह विश्वविद्यालय को बचाने का ‘आखिरी मौका’ है

इनमें से हर डर तथ्यों के आधार पर सवालों के घेरे में है लेकिन राजनीतिक रूप से सही है।

ये नैरेटिव हॉस्टल्स या कक्षाओं के अंदर से नहीं निकले। ये बाहर से आए- भावनाओं से ओतप्रोत भाषण देने वाले किसान यूनियन नेताओं से, बार-बार पंजाबियत के नारे दोहराने वाले पहचान-आधारित समूहों से, केंद्र-विरोधी नया मुद्दा तलाशने वाले राजनीतिक नेताओं से और आंदोलन को अपनी गैर-जरूरी शिकायतों के लिए युद्धक्षेत्र मानने वाले वैचारिक तत्वों से ये नैरेटिव देखने को मिले।

साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर

जब मैंने कानून की अच्छी जानकारी रखने वाले एक ‘समर्थक’ से पूछा कि फीस कैसे बढ़ेगी जबकि अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों का फी स्ट्रक्चर भी बहुत किफायती है तो वह केवल इतना ही कह पाया, “ऐसे ही होता है, नहीं?”

हालाँकि डर तथ्यों से कहीं तेज फैलता है, खासकर तब जब हजारों लोग विश्वविद्यालय के बाहर खड़े होकर यह नारा लगा रहे हों कि ‘पंजाब का आखिरी संस्थान छीना जा रहा है।’

इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि शिक्षा मंत्रालय ने 7 नवंबर को विवादित अधिसूचना वापस ले ली थी। सीनेट संरचना बहाल कर दी गई थी। विश्वविद्यालय ने 9 नवंबर को कार्यक्रम उपराष्ट्रपति कार्यालय को भेज दिया था।

यहाँ तक कि हाई कोर्ट ने भी माना कि कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए और चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए। फिर भी, ऐसे कारणों से जिनका पीयू अधिनियम से कोई लेना-देना नहीं है, कई समूह चाहते हैं कि आंदोलन जारी रहे।

क्यों? क्योंकि अव्यवस्था से उन्हें फायदा मिलता है।

जो हो रहा है वह व्यवस्थित रूप से भड़काया गया भावनात्मक उकसावा है और डर का हर नया दिन उन समूहों की मदद करता है जिनकी सीनेट चुनावों में नहीं, बल्कि आंदोलन को जिंदा रखने में काफी दिलचस्पी है।

हाई कोर्ट का दखल और डर का नैरेटिव का कैसे हुआ पर्दाफाश

14 नवंबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में शायद सबसे तार्किक बात दी। पूर्व सीनेट सदस्यों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो अहम बातें कहीं, जो अगर आंदोलनकारी सच में शांति चाहते तो कैंपस को तुरंत शांत कर सकती थीं।

पहली, कोर्ट ने साफ कहा कि शैक्षणिक गतिविधियाँ तुरंत शुरू होनी चाहिए। जजों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि छात्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए हैं और प्रशासनिक मुद्दों के कारण शिक्षा को रोका नहीं जा सकता।

जब वकील ने कहा कि छात्र सीनेट चुनावों में देरी के कारण आंदोलन कर रहे हैं, तो पीठ ने सीधे कहा, “कृपया अपनी कक्षाओं में वापस जाएँ।”

यह कोई मामूली टिप्पणी नहीं है। एक संवैधानिक अदालत की ओर से छात्रों को पढ़ाई पर लौटने का निर्देश उस पूरे डर को कमजोर करता है, जो फैलाया जा रहा था कि विश्वविद्यालय टूटने या कब्जे के कगार पर है।

दूसरी, कोर्ट ने कहा कि चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए और विश्वविद्यालय पहले ही कार्यक्रम उपराष्ट्रपति (कुलपति) को भेज चुका है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम में कार्यक्रम के लिए कुलपति की ‘मंजtरी’ की आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब है कि प्रक्रिया पहले से ही आगे बढ़ रही है।

केंद्र का पक्ष रखने वाले एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इस बात कि पुष्टि की कि-

विवादित अधिसूचना वापस ले ली गई हैसरकार चाहती है कि चुनाव होंकार्यक्रम प्रक्रिया में हैयह एक विशाल अभ्यास है, जिसमें लगभग साढ़े तीन लाख पंजीकृत स्नातक मतदाता शामिल हैं

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव के लिए ‘सौहार्दपूर्ण वातावरण’ जरूरी है। यह एक सामान्य बात है कि इतनी बड़ी प्रक्रिया बैरिकेड तोड़ने, बाहरी भीड़ और राजनीतिक नारों के बीच नहीं हो सकती।

कुल मिलाकर हाई कोर्ट ने छात्रों की चुनाव कराए जाने की असली माँग को आधिकारिक रूप से मान्यता दी और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि आंदोलन के आसपास का अराजक माहौल बिल्कुल अनावश्यक है। कोर्ट के शब्द सीधे उन डर फैलाने वाले नैरेटिव को काटते हैं जिन्हें यूनियनों और राजनीतिक समूहों ने हवा दी थी।

बाहरी लोग आंदोलन को जारी क्यों रखना चाहते हैं और इसमें कौन-से राजनीतिक लाभ हैं

आंदोलन छात्रों की मूल माँग से कहीं आगे क्यों चला गया, यह समझने के लिए हमें ये देखना होगा कि कैंपस को अशांत बनाए रखने से किसे फायदा हो रहा है। खास बात ये हा कि इनमें से कोई भी लाभार्थी छात्र नहीं हैं।

राजनीतिक दल

आम आदमी पार्टी (AAP), कॉन्ग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) जैसे दलों के लिए पंजाब विश्वविद्यालय एक आसान प्रतीकात्मक युद्धक्षेत्र है। चुनाव नजदीक हैं और नैरेटिव लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में पीयू को ‘पंजाब की पहचान का आखिरी किला खतरे में’ के रूप में पेश किया जा रहा है।

कैंपस में मार्च करना, नारे लगाना और केंद्र पर हमला करना उन्हें राजनीतिक लाभ देता है, जिसका सीनेट से कोई लेना-देना नहीं है।

AAP के मंत्री पहुँचे, कॉन्ग्रेस के विधायक भावनाओं से भरा भाषण देने लगे, SAD नेता पंजाब के रक्षक बनकर सामने आए। लेकिन जब पीयू का बजट घटाया गया, हॉस्टलों में कमी आई या शैक्षणिक निर्णय टाले गए, तब ये नेता कहाँ थे? विश्वविद्यालय के प्रति उनका अचानक दिखा ‘प्यार’ समयबद्ध है, सच्चा नहीं।

किसान यूनियन

संयुक्त किसान मोर्चा में विभाजन और 2021 के बाद घटती भीड़ के चलते कई यूनियनें राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने को बेताब हैं। छात्र आंदोलनों का समर्थन उन्हें नैतिक अधिकार का आभास देता है, जबकि सीनेट चुनावों का कृषि मुद्दों से कोई संबंध नहीं है।

साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर

इसी वजह से पंजाब में यूनियन नेताओं को पूरे जत्थों के साथ ट्रैक्टर और ट्रॉलियों में आते देखा गया। ‘पंजाब के लिए लड़ते किसान पुत्र’ जैसी तस्वीर वहाँ भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है, लेकिन छात्रों की चिंताओं से रणनीतिक रूप से पूरी तरह अलग है।

मजदूर यूनियन और वैचारिक संगठन

ये समूह आंदोलनों को अपने राजनीतिक नैरेटिव आगे बढ़ाने का अवसर मानते हैं। उनके नारे शायद ही कभी छात्रों की माँगों से मेल खाते हैं। बल्कि वे अपने वही वैचारिक फैलाव दोहराते हैं जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई संगठन मूल शिकायत से परे जाकर आंदोलन से जुड़ गए थे।

इनमें से कई संगठनों को अराजकता से ही लाभ मिलता है। आंदोलन जितना लंबा चलता है, उन्हें उतना ही अधिक मंच और दिखने का मौका मिलता है।

कट्टरपंथी- अलगाववादी आवाजें

खालिस्तान के समर्थकों के समानांतर निहंग जैसे व्यक्तियों की मौजूदगी भी एक और परत दिखाती है। ये लोग पीयू को एक प्रतीकात्मक स्थल मानते हैं- एक ऐसी जगह जो पंजाब की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। अगर वे छात्र आंदोलन के अंदर इतिहास में हुए विश्वासघात, राज्य दमन या सांस्कृतिक मालिकाना हक के नैरेटिव बो देंगे तो उन्हें कैंपस से कहीं आगे वैचारिक लाभ मिलता है।

विपक्षी दल और केंद्र-विरोधी नैरेटिव

केंद्र की वापस ली गई अधिसूचना को बीजेपी पर हमला करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि वह अधिसूचना अब सक्रिय ही नहीं है। यह ठीक वही रणनीति है जो किसान कानूनों के साथ अपनाई गई थी।

हालाँकि वे 2021 में वापस ले लिए गए थे, फिर भी वे राजनीतिक दलों, यूनियनों और तथाकथित कार्यकर्ताओं के लिए डर फैलाने का साधन बने हुए हैं।

कंटेंट क्रिएटर्स और कार्यकर्ता

हमें नए दौर के आंदोलन लाभार्थियों को नहीं भूलना चाहिए। इन्फ्लुएंसर्स, हाशिये के कार्यकर्ता, स्थानीय आंदोलनकारी और कुछ छात्र नेता खुद अराजकता जारी रहने पर सामाजिक पूँजी हासिल करते हैं।

एक सुलझा हुआ आंदोलन उन्हें कुछ नहीं देता। एक लंबा खिंचता आंदोलन उन्हें अनुयायी, दृश्यता और ‘युवा नेता’ की पहचान देता है, भले ही उनका मूल मुद्दे से बहुत कम संबंध हो।

इन सभी परतों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। छात्र स्पष्टता चाहते हैं। बाहरी लोग संकट चाहते हैं।

इसका सबसे सरल प्रमाण पीयू छात्र अवतार सिंह से मिला। उन्होंने हमें सीधे बताया कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित होगा, हड़ताल समाप्त हो जाएगी। हालाँकि उन्होंने किसान और मज़दूर यूनियनों की मौजूदगी का समर्थन किया, जो शुरुआत से ही टालना चाहिए था।

छात्र 240 दिन की समयसीमा समझते हैं। वे प्रशासनिक प्रक्रिया समझते हैं। वे केंद्र से नहीं डरते। वे पीयू को बंधक बनाने की कोशिश नहीं कर रहे।

यह बाहरी लोग हैं जो आंदोलन को जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि सीनेट कार्यक्रम उनकी उपयोगिता समाप्त कर देता है।

निष्कर्ष- असली खतरा है आंदोलन का हड़पना, न कि केंद्र

दो सप्ताह के आंदोलन, बैरिकेड्स, एफआईआर और राजनीतिक नाटकों के बाद असली सवाल बहुत सरल है। असल खतरा क्या है? केंद्र ने अपनी अधिसूचना वापस ले ली है। हाई कोर्ट ने सीनेट प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। पीयू अधिनियम स्पष्ट है।

असली खतरा यह है कि छात्रों की चुनाव तिथियों की माँग कितनी आसानी से किसान यूनियनों, मजदूर समूहों, राजनीतिक दलों और पहचान-आधारित संगठनों द्वारा हड़प ली गई।

जो छात्र केवल पढ़ाई करना चाहते हैं, उन्हें डर के नैरेटिव से प्रभावित किया जा रहा है जबकि बाहरी लोग कैंपस का इस्तेमाल अपनी प्रासंगिकता के लिए कर रहे हैं। अदालत चाहती है कि कक्षाएँ फिर से शुरू हों। केवल वे लोग जिनके राजनीतिक मकसद हैं, अराजकता को जारी रखना चाहते हैं।

ये रिपोर्ट मूल रूप से अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।

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