बिहार विधानसभा चुनाव में मनचाहा नतीजा न मिलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने अब एक नया ड्रामा शुरू कर दिया है। अब पार्टी सोशल मीडिया पर काउंटिंग के नंबरों पर सवाल उठाकर ऐसा माहौल बना रही है मानो वोट गिनती में कोई बड़ी ‘सेटिंग’ हुई हो। सोशल मीडिया पर ‘122 की सेटिंग’ जैसे नारे उछालकर कॉन्ग्रेस समर्थकों के बीच वैसा ही भ्रम पैदा किया जा रहा है, जैसा हर चुनाव हारने के बाद विपक्ष करने की कोशिश करता है।
लेकिन असली सवाल ये है, जब 2023 में कर्नाटक और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस भारी मतों से जीती थी, तब क्या उन्होंने अपनी गिनती को भी इसी तरह जाँचा था? अगर हर बड़ी जीत ‘सेटिंग’ है, तो क्या वो जीत भी सेटिंग थीं? और बिहार में RJD की 93-95-97 हजार वाली जीतों पर कॉन्ग्रेसी क्यों खामोश है? आईए एक बार जान लेते है बीजेपी-NDA की जीत को ‘सेटिंग’ बताने वाली कॉन्ग्रेस खुद कितनी ‘सेटिंग’ कर चुकी है।
कॉन्ग्रेस की 100/122 वाली ‘सेटिंग’ का आरोप
बिहार चुनाव नतीजों के बीच कॉन्ग्रेस ने ‘EVM वाली 122 की Setting’ लिखकर ट्वीट किया, मानो मशीनों से ही खेल हो गया हो।
EVM वाली 122 की Setting ⚙️ pic.twitter.com/OgTaxmPU44— Congress (@INCIndia) November 18, 2025
इसी लाइन को आगे बढ़ाते हुए पार्टी की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, “अरे… EVM में तो 100 की Setting भी है। ज्ञानेश जी, कुछ तो बोलिए!”
अरे, EVM में तो 100 की Setting भी है!ज्ञानेश जी, कुछ तो बोलिए pic.twitter.com/V7A4oULXJ4— Supriya Shrinate (@SupriyaShrinate) November 18, 2025
कॉन्ग्रेस का पूरा नैरेटिव यही है कि सिर्फ BJP–NDA की सीटों में कुछ गड़बड़ी है, बाकी जगह सब सामान्य।
कर्नाटक: जब कॉन्ग्रेस के विनर ‘77000’ की लाइन में थे
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के कई उम्मीदवार भी इसी पैटर्न से जीते थे। उदाहरण के लिए- बंगारापेट (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार एस एन नारायणस्वामी को 77292 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार हो हराया था।
मुधोल (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार टिम्मापुर रामप्पा बालाप्पा को 77298 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।
कारवार (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार सतीश कृष्णा सैल को 77445 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।
कित्तूर (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार बाबसाहेब पाटिल को 77536 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।
अगर वोट के आखिरी दो या तीन अंक ‘सेटिंग’ हैं, तो जब कॉन्ग्रेस के जीतने वाले उम्मीदवारों के वोट भी 77000 की लाइन में आकर 292, 298, 445 या 536 पर खत्म हो रहे थे, तब यह ‘जीत की सेटिंग’ क्यों नहीं लगी? तब तो सब कुछ सही था।
तेलंगाना: क्या यहाँ भी ‘87000’ वाली ‘सेटिंग’ थी?
यही हाल तेलंगाना विधानसभा चुनावों में भी था, जहांँ कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की थी। मेडक (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मायनामपल्ली रोहित को 87126 वोट मिले थे।
नागरकुरनूल (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार डॉ कुचकुल्ला राजेश रेड्डी को 87161 वोट मिले थे।
महबूबनगर (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार येन्नम श्रीनिवास रेड्डी को 87227 वोट मिले थे।
चेन्नूर (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार विवेक वेंकट स्वामी को 87541 वोट मिले थे।
यहाँ पर भी वोटिंग का आँकड़ा 87,000 की लाइन में एक-दूसरे के बेहद करीब था। लेकिन तब तो कॉन्ग्रेस ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया। इसका मतलब साफ है, जब खुद की जीत होती है, तो यह ‘ईमानदार गिनती’ होती है, और जब हार होती है, तो यह ‘EVM वाली सेटिंग’ बन जाती है।
बिहार में RJD की 90+ वाली ‘सेटिंग’ पर चुप्पी क्यों?
अब बात करते हैं बिहार के हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों की। कॉन्ग्रेस-RJD के साथ गठबंधन में थी, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनकी सहयोगी RJD की उन सीटों पर क्या ‘सेटिंग’ थी, जहाँ उनके उम्मीदवार भी भारी वोटों से जीते हैं?
महिषी विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार गौतम कृष्णा को 93752 वोट मिले तो वहीं, गोह विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अमरेंद्र कुमार को 93624 वोट मिले। ये ‘93 वाली सेटिंग‘ किसने की?
परू विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार शंकर प्रसाद को 95272 वोट मिले तो वहीं, ब्रह्मपुर विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार शंभू नाथ यादव को 95828 वोट मिले। ये ‘95 वाली सेटिंग‘ किसने की।
इसके अलावा, टिकारी विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अजय कुमार को 97550 वोट मिले और वारसलीगंज विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अनीता को 97833 वोट मिले। ये ’97 वाली सेटिंग’ किसने की। इसका मतलब यह है कि सिर्फ बीजेपी-NDA के जीतने वाली सीटों पर ही उन्हें ‘गड़बड़ी’ नजर आती है।
हार छुपाने का बचकाना तरीका
असलियत यह है कि वोटों की गिनती में संख्या किसी भी अंक पर खत्म हो सकती है, यह कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि लाखों वोटर्स की अलग-अलग पसंद का गणित है। जब कर्नाटक और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस को जीत मिली, तो यही आँकड़े उनकी सफलता का प्रमाण थे।
लेकिन बिहार में हारने के बाद, इस तरह के बेबुनियाद और फर्जी आरोप लगाना सिर्फ अपनी हार को छुपाने का एक बचकाना तरीका है, जो लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर से लोगों का भरोसा कम करने की कोशिश है। कॉन्ग्रेस को चाहिए कि वह EVM पर सवाल उठाने से पहले अपनी कमियों पर ध्यान दे।







